काल का प्रहार - आशापूर्णा देवी Kaal Ka Prahar - Hindi book by - Ashapurna Devi
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काल का प्रहार

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15412
आईएसबीएन :000

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आशापूर्णा देवी का एक श्रेष्ठ उपन्यास

18

आते-आते नाक पर कपड़ा डालना पड़ा। हाँ बुद्ध, पहले वाले साहबों वाले मोहल्ले भी इसी तरह के हो गये हैं? साहब तो देश से भगा दिये गये। आहा ! उन सड़कों की सुन्दरता देखने लायक हुआ करती थी।

बुद्ध बोले-अच्छा बुआ, इधर तो सुना था कि आप लोग हरम में कैद होकर बड़ी हुई–तो साहबों का मोहल्ला वगैरह देंखा कब?

हाय। सुन लो बात ! कैद थे तो कलकत्ता दर्शन में तो पाबन्दी नहीं थी। जादूघर, चिड़ियाखाना, गड़ का मैदान राजेन मल्लिक गृह, हाबड़ा पुल, काली घाट, दक्षिणेश्वर, यह सब तो देखने जाते थे। इधर-उधर के मेहमान आते तो उनके बच्चों को लेकर गाड़ी भर कर कलकत्ता दिखाने ले जाया जाता। बड़ों को कालीघाट, दक्षिणेश्वर, स्टार थियेटर, यह सब तो अतिथि स्तकार का विशेष अंग था। घर के बच्चे भी जाते। खेर्दू तुझे याद है, नया कोई आगन्तुक आने से हमें बड़ा आनन्द आता। खाना-पीना, घूमना-घामना।

मैं बोली-दलूमौसी तुम्हारी तरह मेरी स्मृति शक्ति इतनी प्रखर नहीं थी, तुम बता रही हो याद आ रहा है।

दलूमौसी थोड़ा हँस दी। अरी दलूमौसी तो स्मृति सागर का रोमन्थन करके ही जीवन काट रही है। उसका जीवन तो अतीत से जुड़ा है जो आज भी वहीं का वही खड़ा है। हांलाकि सब जगह जाते उसी घोड़ा गाड़ी में जिसकी खिड़कियाँ बन्द रहती। पर बीच से जो जगह थी उससे तो सब दिख जाता था। आहा सड़कें प्राणों को जैसे मोह लेतीं। रास्ते में निकलते ही आनन्द का सागर उमड़ने लगता। तुम लोगों के इस कलकत्ते में ऐसा हो सकता है? जितनी देखा उसे देख कर यही लगा कि कलकत्ता इन्सानों के रहने के काबिल नहीं रहा।

बुआजी-अब स्नान नहीं करेंगी? सिर्फ कलकत्ता की बुराई ही करती रहेंगी?

हाँ रे जा रही हूँ। बुराई नहीं, अफसोस। कुछ दिन तो रहेंगी ना धीरे-धीरे करियेगा। दलूमौसी उठ कर तौलिया, लोटा निकालते-निकालते बोली-कैसे रहूँ अभी से ही तो प्राण घबड़ा रहा है। हर जगह रसोई, घर का कौन कहाँ है कुछ पता नहीं लगता। इसी घर में कितने सदस्य थे। हाँ रे बूढ़े को तो नहीं देखा?

बूढ़ा दा तो रिटायर करके लड़के के पास दुर्गापुर में रहते है।

उसकी पत्नी?

भाभी तो लड़की के पास है कनाड़ी में। कुछ दिनों के लिए ही गई है।

बढ़िया ! भाभी कनाड़ा में और क्या-क्या सुनाना बाकी है? तुम लोग बड़ों को ऐसे नहीं कहते 'गई हैं' या कर रही है आदि-आदि।

अरे सर्वनाश ! सिर्फ आँखें ही नहीं आपके कान भी अभी भी तेज हैं? हा हा हा। वह सब हैं तो प्राचीन हो चुका है।

प्रवुद्ध थोड़ी बदमाशी लहजे में बोला-आजकल के लड़के लड़कियाँ तो-पति, पत्नी भी तू कहकर बात करते है।

छिः ! छिः ! नीचों की तरह। यही कलकत्ता सभ्यता का पीठस्थान था। इसे तू कलकत्ता कहता है? एक नया नाम दे ना सारा झंझट ही मिट जाये।

दलूमौसी स्नान का सामान लेकर आगे बढ़ी। बोलीं-पानी भर है तो चौबारे में? सब तो बदल गया है? हमारा लड़कियों वाला स्नान-घर है। या नहीं? बड़े-बड़े पानी-।

सीढ़ी के पास वाला बड़ा बाथरूम वह तो कभी का तोड़ दिया गया।

एक कमरे की जमीन बर्बाद करके पानी भर कर रखना? वहाँ पास पम्प लगाया गया है। हर वक्त नल से पानी गिरता है। पम्प से उठाया जाता है।

दलूमौसी के स्वर में संशय था।

हाँ।

दलूमौसी के भतीजे के स्वर में भरोसे का तेज था।

भयहीन होकर जाइये, पानी मिलेगा। तुम जरा दिखा दो।

दलूमौसी-इस घर को मुझे दिखाना पड़ेगा? पर तुम लोगों ने तो घरे को बर्फी की तरह भागों में बाँट रखा है, दिखाना ही पड़ेगा। तुम लोगों का पम्प लाइट से चलता है?

हाँ।

पानी वाली जगह तो तोड़ कर रख दिया सुना है कलकत्ते में अब लाइट अपनी ख्याल खुशी से चलती है। वह बिगड़ जाये?

मैं हँस पड़ी-बिगड़ने से हाहाकार मच जाता है। हूँ, समझ गई। कलकत्ता को अब यह दुर्मति ही भाता है। सब कुछ पुराना तुड़वा कर नया बन्दोवस्त। हांलाकि व्यवस्था की नींव नहीं है। पानी का संचय गृहस्थ की लक्ष्मी होता है। घड़ा, चौबारा, टंकी यह सब नहीं रहेगा। क्या पता? इस काल में ऐसे चलन है कि सब को बेहाल करने में ही मजा। हूँ।

बुआ जी अपने भतीजे और पत्नी को लाजबाव रख कर चली गईं।

सुना था दलूमौसी अपने जीवन के अन्तिम समय में अपना जन्मस्थान देखने सात दिनों के लिए आईं थीं। अब सुन रही हूँ तीन दिनों से अधिक नहीं रहेंगी। उनकी मोह-भ्रान्त था। इस कलकत्ते में क्या इन्सीन रहते है।? एक दिन में ही दम घुटने लगा। मुझे आदेश-तीन दिन मैं हूँ। तुझे रहनी है। नये चेहरे देख प्राण हाँफ उठे हैं। घर के दूसरे लोग तो झांकते भी नहीं। आँखों का पर्दा हट गया है।

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