काल का प्रहार - आशापूर्णा देवी Kaal Ka Prahar - Hindi book by - Ashapurna Devi
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काल का प्रहार

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15412
आईएसबीएन :000

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आशापूर्णा देवी का एक श्रेष्ठ उपन्यास

12

उस देवर की बेटी की बड़ी मुश्किल हो गई थी। ज्यादा दिन पहले ब्याह नहीं हुआ था। शादी से पहले वर को लिखी-पढ़ी लड़की की चाह थी उस ओर से यही बताया गया था कन्या चार कक्षा पास है। ये भी सरल मन से विश्वास कर पूँटी को ब्याह करके ले आये थे। ब्याह के बाद एक साल घरबसत नहीं हुई थी, पूँटी पितृगृह- जब अपने पितृगृह को आलोकित कर रही थीं तब पति उसे किताबों के पहाड़ देकर आया था और यह भी अनुरोध किया था कि पूँटी उन्हें पढ़े जिससे ससुराल में आने पर पति अपनी पत्नी के साथ साहित्य आलोचना को रस प्राप्त कर सकें।

यह रहने की बात नहीं कि उत्कृष्ट साहित्य ग्रन्थों पर अभी तक हाथ भी नहीं गया। पूँटी की समझ से बाहर था।

अब? किताबों का प्रेमी पंति रात में पत्नी को प्रश्न ना कर बैठे-किताब कैसी लगी या किसकी लेखनी तुम्हें. अच्छी लगी या कौन-सी किताब पसन्द है? ‘आँख की किरकिरी' 'विनोदिनी को दु:ख' या कृष्णकान्त की वसीयत'?

नया वर कहाँ पत्नी को प्यार के सागर में डुबोयेगा-वह ना करके रोज बीवी के माथे पर थोड़ा-थोड़ा पत्थर तोड़ने लगा था।

कृष्णभामिनी को जब इस मर्मान्तक अवस्था का समाचार मिला तो वह देवर की बेटी के दुख से बेहाल हो उठीं और घर लौट करे दामाद की बुराई में पंचमुखी हो उठीं। वह भी लड़कियों के सामने।

जो लड़कियाँ बड़े से कमरे के विशाल दो चौकियों पर बिछे मैदान की तरह बिस्तरे पर अलग-अलग तकिये के बदले लम्बे तकिये पर सिर रख करे (जो चौकी जितनी ही लम्बा होता) सोतीं और गप्पें लड़ातीं।

दलूमौसी जमीन पर बिस्तर बिछाके अलग सोती माथे के नीचे अलग तकिया। दलूमौसी के माथे के नजदीक देर रात तक लालटेन जलती, जब वह कविता लिखतीं।

हतभागी कहानी लिखने वाली थी। इन सुख-सुविधाओं की भागीदार थी। वह तो गौण मुद्दा था।

कृष्णभामिनी ने उस विद्यावती का ही पकड़ाव किया। रात दिन तो हाथ में खाता देखती हूँ, एक औरत की भलाई कर सकती हो?

हाय ! वह क्या? क्यों नहीं? कैसा उपकार?

पता लगा उपकार कुछ भी नहीं सिर्फ दोपहर को विचारी पूँटी को थोड़ा वक्त- आलतू-फालतू उपन्यास पढ़ कर सुनाने पड़ेंगे, जिससे वह बिचारी वर के पास छोटी ना बने?

“वह अभी नहीं पढ़ा' या 'वह अभी देखा नहीं', कहकर कब तक मिलावट से काम चलाया जा सकता है। इसके बाद लड़की को पति से झाड़ खानी पड़ेगी। दामाद को भी बलिहारी जाऊँ? लोग तो पत्नी का उपन्यास पढ़ने का रोग देख कर जल कर राख हो जाते हैं और यह अपने परिवार को उसी रस में डुबो कर रखने की फिक्र में हैं।

कृष्णभामिनी का ऐसा प्रस्ताव घर के बाकी लोगों की इच्छानुरूप था। ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, पर दीदी की इच्छा थी। दीदी की परम भावप्रवण उद्वेरक स्थल-ससुराल। कोई यह ना कह सका-वह क्या करने जायेगी वहाँ?

वह लड़की तो स्वयं ही अक्षर से परिचय कर, जो मिलता है उसी को सटके जाती थी, नाटक-उपन्यास कुछ भी बाकी नहीं छोड़े थे।

यह भी एक रहस्य था उसे मिलता कहाँ से है? कैसे भी उसे मिल ही जाता है। तभी तो वह बच्ची नौवेल क्या पढ़ेगी। वह भी नहीं कह सके?

इसी बात को घुमाकर नये दादा ने कहा-लड़की अगर इतनी ही निरक्षर थी तो काहे को झूठ कहा था? बात सुनो। धोंता तू भी जैसे किसी अजब दुनिया से आ टपका है।

लड़की की शादी देते वक्त कौन बातें नहीं बनाता? हम तुम नहीं करते? जो लड़की करछुल पकड़ना भी भली प्रकार नहीं जानती उसे रन्धन में द्रोपदी, की संज्ञा, जो लड़की सुई में धागा नहीं डाल पाती, उसके नाम से कितने ही सुचारु काम वाले उपकरण लाके दिखाये जाते हैं। यही रीत तो हमेशा से चली आ रही है? वर के तुच्छ ख्याल से कौन लड़की का पिता इतने अच्छे वर को हाथ से जाने देगा? घोंता भी धोतं-धोतं करने लगे हूँ अब लड़के अंग्रेजी फैशन के वश में आकर लिखी-पढ़ी नाटक-नौवेल पढ़ने वाली पत्नी चाहते हैं-इसके बाद पता चलेगा जब-इसका नतीजा सामने आयेगा? औरत को अगर ज्यादा पढ़ाया जाय तो इसका परिणाम कितना भयंकर होता है। ईश्वर गुप्त तो सावधान भी कर गये थे। वह आज हँसी का विषय बन गया है। इसके बाद लड़के भुगतेंगे। कितने पानी पार होना पड़ेगा। इसके बाद तो लड़कियाँ लड़कों के मुँह पर स्याही पोत कर दफ्तर में नौकरी करने जायेंगी-यह मैं दिव्यदृष्टि से देख पा रहा हूँ।

हाय नये दादा-अगर दीर्घ जीवन पाते तो देखते केवल दफ्तर-नाक पर स्याही फेरने वाली कितनी ही नजीरें अक्षों मे बार?

फिर भी कुछ-कुछ देख गये है। तुम्हारी लड़की के घर की पोती सबके नाक के नीचे से उच्च शिक्षा लाभ करने विदेश गई? पर तब तो तुम्हीं घमण्ड से लोगों को बुला-बुला कर उसकी कीर्ति गाथा का बखान करने लगे। पर वह सब तो काफी बाद की घटनायें हैं।

उस दिन-धोतन की उष्मा पूँटीं के लिए जिसे पड़ाने इस घर की लड़की दौड़ी जायेगी? वह भी पढ़कर सुनाने। पर कृष्णभाविनी की इसमें एकक राय थी। तब तो कोई चारा ना रहा। विचारी लड़की को पतिसुख से वंचित ना होना पड़े इसका ख्याल भी तो रखना होगा। तब नये दादा नीरस स्वर से बोले-उस घर में क्या और कोई पढ़ना-लिखना नहीं जानता?

जानेगा नहीं? दूसरी बहुएं तो किताब पड़ती हैं शायद। पर उनके पास इतना वक्त कहाँ कि देवर की बीवी को नौवेल पढ कर सुनायें। एक छोटा देवर भी है। उसके कमरे में अल्मारी भरी किताब हैं। उसने दो पास दे के एक और पास की पढ़ाई में जुटा है।

कहने से वह सुना सकता है। पर इतने बड़े देवर के सामने बैठकर उसके मुँह से नाटक-नौवेल का रस लेगी? नीति-अनीति, उचित-अनुचित भी तो है। इसके अलावा पूंटी के लिए 'काला अक्षर भैंस बराबर' वह बात तो सबको पता चल जायेगी। तू काहे को इतना परेशान हो रहा है? सड़क पार कर तो जाना नहीं पड़ेगा-छत छत हैं-तीन घरों का छत एक साथ है।

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