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तुलसी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :72
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15410
आईएसबीएन :81-8113-018-9

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आशापूर्णा देवी का लेखन उनका निजी संसार नहीं है। वे हमारे आस-पास फैले संसार का विस्तारमात्र हैं। इनके उपन्यास मूलतः नारी केन्द्रित होते हैं...

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अभी लोग उसे चलने-फिरने, हँसने बोलने, उसके पहनने-ओढ़ने पर फब्तियाँ जरूर कसते हैं, मगर और कुछ कहने का साहस है उनमें? ऐसा वे कह नहीं सकते। जितनी निन्दा तुलसी की होती है उसकी परवाह वह नहीं करती। उसे तो वह पाँव तले रौंद कर अपने रास्ते चली जाती है।

तुलसी को अगर लोक-निन्दा का डर होता, तो रात को दस बजे रेल-स्टेशन के करीब की चाय की गुमटी में ताश की महफिल में आकर न जमती।

रूप बदलते-बदलते तुलसी ने अब बाबुओं के घरों की बहू-बेटियों का रूप धर लिया है। अब वह अच्छे छींट की रंगीन ब्लाउज पहनती है, सीधे पल्ले से ओढ़ती है साड़ी। पहनती भी है हल्के प्रिन्ट की साड़ियाँ। चूड़ी वह पहनती नहीं, सिर्फ एक-एक कड़ा है उसकी कलाईयों पर। किसी जमाने में वह हाथ भर-भर काँच की चूड़ियाँ पहनती थी, लेकिन आया का काम करते वक्त खनकती चूडियाँ आड़े आती थीं, इसलिये उन्हें उतार फेंका है। सिर में वह खूब सारा तेल चुपड़ कर टाइट जुड़ा करती है, फिर भी माथे पर हल्की लटें लटक ही आती हैं। ऐसे ही ये लटें लटकती थीं जब वह छोटी थी, जब उसके बालों में तेल का नाम भी न होता था, कंघी-चोटी जब वह करती न थी। उसके उन लटकते लटों को जो देखता, शैतान लड़की है जानते हुए भी उसके मन में ममता जाग उठती।

सड़क पर न जाने कहाँ से रोशनी आई। उसी से दिखाई पड़ा कि तुलसी आ रही है। जो ताश में डूबे हों उनके लिये उसका आगमन जान पाना सम्भव नहीं था, पर, इत्तफाक की बात है उसी क्षण सुखेन ने ताश बँटने के अवसर पर आँखें उठा कर यह कहते हुए बाहर देखा, 'क्या जाने कितने बज गये। ज्यादा देर हो जायेगी तो घर पर फिर गदर मच जायेगा।' घर के नाम पर सुखेन के है, समय से पहले बूढ़ा बाप और झगड़ालू बुआ। फिर भी, सुखेन को ही घर की याद सबसे पहले आती है। अपनी बात कहने के साथ ही सुखने ने फुसफुसाकर कहा, ''नखरेवाली आ रही है।'

चौंक कर सबने देखा।

राजेन ने धीरे से पूछा, 'आज नाइट ड्यूटी नहीं है क्या?'

'नहीं होगी।'

जग्गू ने कहा, 'अब हमारी बाजी का सत्यानाश करेगी।'

और ननी ने भी खीझकर कहा 'ओफ!' पर ताज्जुब यह है कि साथ ही साथ सब के मन में ही खुशी की एक हल्की-सी लहर भी दौड़ गयी।

ऐसा ही विचित्र है यह मन।

अच्छा लगना और अच्छा नहीं लगना एक साथ ही आते हैं।

फिर भी उन्होंने उसे न देख पाने का बहाना किया।

अपना-अपना ताश उठाने लगे।

सामने बिछी हुई चौकियों के बगल से निकलती हुई तुलसी एकदम दुकान के अन्दर जा पहुँची। उसका स्पष्ट स्वर गूँज उठा 'धत तेरे की! वही टेयेन्टिनाइन का ही खेल हो रहा है! तुम लोग बड़े ही नहीं हुये?'

सुखेन के साथ ही उसकी तू तू-मैं मैं सब से ज्यादा होती है, उसने कहा, 'तो फिर देवी, क्या हुक्म है? जुआ खेलूँ?'

'खेल तो, वही है!'

वह तो 'बाबू-भैया' लोगों का खेल है, 'कहाँ राजेन ने, 'हमारे पास जुआ की बाजी के लिये पैसे कहाँ?'

'जुआ का पैसा जुआ से ही आता है।' चौकी पर बैठती हुई बोली तुलसी, 'चाय सारी पी डाली है? ओ जी ननी दा?'

'मुझे क्या पता कि तू आयेगी!'

'पता होना चाहिये था।'

'कैसे होता? मुझे हाथ देखना तो आता नहीं।'

'वह भी सीखना चाहिये था।'

तुलसी बोली 'अरे ओ' लोगों, किसके जेब में सिगरेट है, दे तो इधर।' आजकल तो कमीज पतलून ही जातीय पोशाक है, अतएव सुखेन, राजेन और जग्गू तीनों ने ही पतलून की जेब में हाथ डाल एक-एक बीड़ी निकाल उसकी तरफ बढ़ाया। ननी धोती-बनियान में था, उसके पास जेब थी ही नहीं।  

'बीड़ी?' नाक चढ़ा कर बोली तुलसी, 'अपने को सुधारने का मन ही नहीं होता न? जो थे वही रह गये।' अपने साथ लाये बटुवे को खोल तुलसी ने सिगरेट का पैकेट निकाला। उसमें से तीन सिगरेट निकाल उन्हें देती हुई बोली, 'ले, पी। पी कर देख, अच्छी चीज किसे कहते हैं।'

उसकी दी हुई सिगरेट इन लोगों ने बड़ी खुशी से ले माचिस पर ठोंकते हुये कहा, 'अब तू पैसे वाली हो गई है। अच्छी चीज तू नहीं दिखायेगी तो कौन दिखायेगा?'

तुलसी ने एक अपने लिये सुलगा कर पैकेट ननी की ओर बढ़ाते हुए कहा, 'पीओगे ननी भैया?'

ननी उसकी सिगरेट लेता नहीं। कहता है, 'बढ़िया चीज गरीबों को सहती नहीं। जिसे पीना है वह पिये। औरतों को धुँआ उगलते देख मुझे उबकाई आती है।'

उबकाई आने वाला दृश्य बड़े आराम से ननी के सामने पेश करते हुये तुलसी बोलीं, 'तुमने मुझे अभी तक औरत समझ रखा है ननी भैया? यह बात तो मैं खुद भूल गई हूँ।'

'शाबाशी पाने लायक बात नहीं है वह।' कह ननी ने आले से बीड़ी उतारी और अपने लिये सुलगाई।

'बीड़ी की महक से मुझे चक्कर आता है?' तुलसी ने कहा।

सुखेन ने चुटकी ली, 'अब तो चक्कर खायेगा ही तेरा सिर। बहुत कीमती सिर हो गया न! जमाना था जब अधजली बीड़ी के लिये तू छुछुआती फिरती थी। तुझे वह जमाना याद न भी हो तो क्या रे तुलसी हम उसे नही भूले हैं।'

बात सुखेन ने सच ही कहीं है।

तुलसी के बाल्य-कैशोर के प्रधान साथी ही थे यही तीनों। एक और भी था। वह था फणी। एक दिन कटखनी तुलसी ने फणी की बाँह पर दाँतों से काट कर खून बहा दिया था। उसी दिन से उसने फणी के साथ सब सम्पर्क भी त्याग दिया था।

सुखेन, राजेन, जग्गू क्रोध से पागल हो पूछते रहे, 'बोल तू, बता हमें, साले ने तुझसे क्या कहा था? क्या चाहता था वह, हम उसे अभी खत्म कर देंगे।'

संजीदगी से तुलसी बोली थी, 'जा जा, रहने दे। मेरे मामलों में किसी को सिर खपाने की जरूरत नहीं। वह जो कहने आया था, वह तुममें से कोई भी, किसी भी वक्त कह सकता है। मर्द जात पर भरोसा क्या?'

कैशोर काल की मूर्खता से वशीभूत हो, किसी एक समय ये तीनों उच्चके, इस बेलगाम छोकरी के इर्द-गिर्द मंडराया करते। आशा कि अगर जरा भी घनिष्ठता हो। पर नतीजा कुछ भी न निकला था। वे इस लड़की से सदा डरते रहे हैं, बराबर। इन्हीं की मेहरबानी से तुलसी ने सिगरेट पीना सीखा। तीनों में सुखेन ही सबसे अधिक साहसी था। वही उसे जब तब बुलाकर कहता, 'आ देख पीकर, कितना मजा आता है।' लेकिन इस मजे के बदले सुखेन ने अगर किसी और मजे की आशा प्रकट की तो उसे एक थप्पड़ जड़ उसकी बीड़ी उसी के मुँह पर मार तुलसी चल देती वहाँ से। फिर? फिर सुखेन को ही उसकी खुशामद करनी पड़ती, कसमें खानी पड़तीं।

तुलसी कड़क कर कहती, 'याद रखना अपनी कसमें। जब तक दोस्ती है, ठीक है। अगर मेरे साथ दुश्मनी करेगा तो जान से मार दूँगी तुझे। इन लड़कों के साथ ननी इस तरह कभी भी नहीं घूमता था। वजह यह थी कि उम्र में इनसे वह थोड़ा बड़ा तो था ही, ऊपर से सदा सताये रहती थी पेट की चिन्ता। दुकान तो उसने आज नहीं खोली है। खोली थी जब तब वह छोटा ही था।

किसी जमाने में तुलसी भी उसकी दूकान में बहुत काम कर दिया करती थी। तुलसी तो सब दिन की 'घर की बैरन, जग की मन भावन' है। बटन टूटे, पीट खुले गन्दे फ्रॉक में ही वह दूकान में आ धमकती। चूल्हा धौंकती, चाय के गिलास धो दिया करती। उस जमाने में फणी भी दुकान के कामों में हाथ बँटाता था। धीरे-धीरे तुलसी ने फ्रॉक छोड़ी धोती पहनना शुरू किया। पर किसी ने ख्याल न किया कि तुलसी बड़ी हो गई है।

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