मंजरी - आशापूर्णा देवी Manjari - Hindi book by - Ashapurna Devi
लोगों की राय

नई पुस्तकें >> मंजरी

मंजरी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15409
आईएसबीएन :0000000000

Like this Hindi book 0

5 पाठक हैं

आशापूर्णा देवी का मर्मस्पर्शी उपन्यास....

24

सोचते-सोचते चंचला का मन भारी हो उठा-सहसा उसकी आंखें भर आईं। कभी-कभी छोटी मौसी को देखने की बड़ी इच्छा होती है। देखने की इच्छा होती छोटी मौसी पहचानती है या नहीं, उससे बात करती है या नहीं।

लेकिन ऐसा वह कैसे करे?

सुनने में आ रहा है कि वह कलकत्ता छोड़कर बंबई चली जा रही है। कौन जाने हमेशा-हमेशा के लिए खो तो नहीं जाएगी छोटी मौसी।

किसी-किसी दिन रात को, जब नींद नहीं आती है मंजरी को, तब बिस्तर पर लेटे रहना असंभव हो जाता है। वह जाकर बारामदे में बैठती है, तारों से भरे आकाश को, असहाय सूनेपन से, आंखों में उदासी लिए देखा करती और सोचा करती कि क्या सारी दुनिया छिन्न-भित्र हो गयी है, उसकी चिर परिचित दुनिया का हमेशा के लिए निश्चिंत हो गयी है। लेकिन ऐसा सोचना उसकी भूल थी। अपने परिचित जगत के हर मन में वह जीवित थी।

जीवित थी 'जलन' के रूप में।

अपमान की जलन, अभिमान की जलन, विस्मय की जलन, ईर्ष्या की जलन।

दिन के समय मन का चेहरा बदल जाता है।

दिन के समय मंजरी को इस बात का कतई दुःख नहीं होता है कि उसे कोई याद करता है या नहीं। उस वक्त तो सिर्फ आगे बढ़ना रहता है। जय का पथ, यश का पथ। उपने आपको ध्वस्त कर छित्र-भित्रकर, खंड-खंड कर उसने विकसित करना चाहा था।

यही तो चाहा था।

लालित्य, लावण्य से अपने को विकसित करना।

यही चाहा था न मंजरी ने?

हां चाहा तो था। समझकर या गलती से, आग को छूने से वह अपना स्वधर्म कहां छोड़ती है? अबोध जानकर क्षमा करती है क्या?

रंगीन कांच के गिलास की चमक पर मुग्ध होकर मंजरी ने हाथ बढ़ाकर जहर के बर्तन में मुंह लगाकर जहर पीया है, विष दाह शुरू नहीं होगा क्या?

उसके बाद?

उसके बाद तो मरना है ही।

आज छुट्टी है।

आज शूटिंग नहीं है।

बहुत मुश्किल से और बहुत प्रयत्न करने पर यह छुट्टी निकल सकी थी। घर पर आज कुछ अतिथियों को आमंत्रित कर रखा है मंजरी ने।

हां, अपने घर में इस तरह की पार्टी देने का साहस मंजरी में हुआ है। रुपया माने ही साहस।

अभी तक कोई निमंत्रित आया नहीं था।

ड्रेसिंग टेबिल के शीशे के सामने खड़ी होकर मंजरी प्रसाधन कर रही थी। अपने आपको मनोहारिणी बनाने की साधना कर रही थी।

उसने समुद्री रंग की रेशमी साड़ी जो कि पानी की तरह स्वच्छ थी, पारदर्शी। उसका रूपहला जरी का किनारा साड़ी के भार को बनाये रखने में सहायता कर रहा था।

मंजरी पहले कभी सोच सकती थी कि सात तह में भी जिसकी पारदर्शिता जाती नहीं है वैसी साड़ी पहनकर बिना किसी शर्म के वह घूमती फिर सकती है?

लेकिन इस वक्त आराम से ऐसा ही कर रही है।

इस समुद्री रंग की साड़ी से मैच करता एक सिंदूरी रंग का ब्लाउज पहन रखा था उसने। दोनों हाथ़ों में दो ढीले-ढीले कड़े, गले में चौड़ा गुलूबंध। बालों को एक सफेद रिबन से ढीला करके बांधकर छोड़ दिया था। पांव में जरी की चप्पल।

रंग से लाल चेहरे पर एक बार और पाउडर का पफ घिसकर, होंठों की लाली और आंखों के सुरमा की बारीकी को चेककर लिया मंजरी ने।

मनोहारिणी नहीं मनमोहिनी।

मंजरी कभी भी गोरी नहीं थी, सांवली थी लेकिन अब यह बात कोई कह नहीं सकता था।

प्रसाधान समाप्त कर बैठक में जाने से पहले मंजरी मुस्करा उठी।

बंबई की तारिकाओं के आगे क्या वह हार स्वीकार करेगी?

ईश।

सहसा हंसी गायब हो गयी। उसकी जगह ले ली क्लांति ने।

लड़खड़ाते पैरों से आकर सोफे पर बैठ गयी।

आश्चर्य!

उसकी पुरानी दुनिया क्या सचमुच ही इस शहर से विलुप्त हो गयी है? वरना किसी बहाने, एक पल के लिए भी किसी की एक झलक तक क्यों नहीं दीखती है? संभव असंभव कितनी जगहों में तो परिचित लोगों से भेंट हो जाती है। सिर्फ मंजरी का भाग्य ही क्या दूसरे विधाता ने बनाया है?

इतनी जल्दी, पैसा आते ही मोटर खरीदने की क्या जरूरत थी मंजरी को? खरीदा है जरा सा मौका पाते ही ड्राइवर को लेकर रास्तों का चक्कर काटने के लिए। जबकि जिस मोहल्ले में जाने पर अवश्य ही कोई मिल सकता है, वहां जाने की हिम्मत नहीं होती है। केवल आस पास, यहां वहां चक्कर काटती है।

लेकिन आश्चर्य है! मंजरी की पुरानी दुनिया मानो शहर से ही गायब हो गयी है। लेकिन मंजरी क्यों इतनी बेवकूफी की हरकत करती है?

न जाने कितने दिन रातों को कार निकलवाकर अभिसारिका सी तैयार होकर, निश्चित प्रतिज्ञा कर द्विविधा संकोच त्यागकर एक खास रास्ते की तरफ जाने का निर्देश देती है। देखेगी आज भी दुंमजिले उस कमरे में देर रात तक बत्ती जलती है या नहीं, देखेगी खिड़की पर बड़े प्यार से सूई की गयी कढ़ाई वाला पर्दा लटका है या नहीं, देखेगी सोने से पहले कुछ क्षण के लिए एक विशेष व्यक्ति बारामदे में आकर खड़ा हुआ या नहीं।

काफी रात गए अगर एक खास मकान के सामने एक मोटर चक्कर काटती है तो कौन देखने जा रहा है?

सब कुछ सोचकर हिम्मत कर मोटर निकालने के लिए कहती है लेकिन रास्ते पर निकलते ही एक भयानक भय उसके मन को शिथिल कर डालता, दिल धड़कने लगता-ठीक से पता ही न बता पाती। सिर्फ इधर-उधर घुमाने का निर्देश देती है तो दिल का बोझ हल्का होता। शांत भाव से बैठकर जी भरकर बाहरी हवा को भीतर खींचने लगती-

न:, कभी भी उस बहुपरिचित रास्ते का नाम ड्राइवर के आगे उच्चारित न कर सकी।

फिर भी हर दिन सुबह उठते ही मन के एकांत कोने में क्षीण सी एक आशा की किरण झलक दिखाने लगती। हर दिन लगता ''आज जरूर जाऊंगी।''

वनलता की दासी मालती मालकिन के पीछे-पीछे आने पर भी पहला सवाल पूछती है, ''क्यों नई दीदीजी, आपके घर में आज किस बात का उत्सव है?''

मंजरी ललित हंसी हंसकर बोली, ''अपने आप ही अपना फेयरवेल पार्टी दे रही हूं।''

वे लोग बैठीं।

वनलता बोली, ''वहां वालों के साथ कंट्रैक्ट साइन हो गया है?''

''हूं।''

''किसके साथ?''

मंजरी ने बंबई के एक सुविख्यात चित्रनिर्माता कंपनी का नाम बताया

''कितनों दिनों के लिए?''

''फिलहाल तो साल भर। उसके बाद... उसके बाद शायद यहां कभी वापस ही न आऊं।''

'बंगाल को काना बनाकर हमेशा के लिए चली जाना क्यों चाहती है?''

मंजरी की सुरमा लगी आंखों की पलकें कांप उठीं। उदास भाव से बोली, ''यहां मुझे कौन चाहता है लता दी?''

इससे पहले कि वनलता कुछ कहे, थोड़ी दूर पर खड़ी मालती मधुर कंठ से बोल उठी, ''ओ मां। ये क्या कह रही हो नई दीदीजी। यहां आपको तो सभी चाहते हैं।''

वनलता ने गंभीर होकर उससे कहा, ''अच्छा, फिलहाल तुम्हें कोई नहीं चाह रहा है-तुम बाहर जाकर बैठ सकती हो।''

अपमान से लाल सुर्ख चेहरा लेकर एक झटके में मालती बाहर चली गयी।

''और कौन-कौन आयेगा?'' वनलता ने पूछा।

''ज्यादा लोग नहीं हैं-श्यामल सेन, लोकेश मल्लिक, रेबादास, निशीथ राय, आनंदकुमार... ''

वनलता ने तिरछा कटाक्ष किया, ''उसे भी?''

''कहा।'' मंजरी उदास भाव से बोली, ''जाते वक्त विदा करो भाई सबको मैं प्रणाम करती जाऊं।''

वनलता ने हीरे की अंगूठी वाली चंपाकली जैसी अंगुली से माथे पर उड़ आए बालों को धीरे से हटाते हुए बोली, ''ये तो वह यात्रा नहीं है, ये तो है सर्वनाश के आकर्षण की यात्रा।''

''सर्वनाश के बीच ही तो घोंसला बनाया है।''

''फिर भी-यहां तुम्हारी रक्षा करता रहा है जन्मकाल का बंधन, जन्म भर के संस्कार, वहां तो तुम बहाव के साथ बहती काई होगी।''

मंजरी धीरे से हंसी, ''जो कमल होकर न खिला, उसकी किस्मत में काई बनकर बहना ही लिखा है।''

वनलता मिनट भर स्तब्ध रहने के बाद बोलीं, ''तुझे याद होगा, मुझे एक दिन तूने कहा था, ''चाहो तो तुम अच्छी हो सकती हो लता दी।''

''है याद?''

अचानक पेंट पाउडर के मध्य उभर आया मलिन उदास चेहरा बहुत ही करुण-लेकिन सिर्फ थोड़ी देर के लिए। उसी करुण हो गये चेहरे पर हंसी उभर आई... बेतुकी लापरवाह हंसी। हंसते-हंसते बेहाल बोली, ''याद क्यों नहीं होगा, खूब याद है। वही सवाल अब क्या तुम मुझसे करोगी?''

''यही सोच रही हूं।''

''लेकिन उसका जवाब तो तुमने खुद उस दिन दिया था लता दी।''

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book