चश्में बदल जाते हैं - आशापूर्णा देवी Chasme Badal Jate Hain - Hindi book by - Ashapurna Devi
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चश्में बदल जाते हैं

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :103
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15408
आईएसबीएन :0000000000

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बाप बेटा को समझाना चाहता है कि युग बदल गया है-तुम्हारा चश्मा बदलना जरूरी है। वृद्ध पिता के चेहरे पर हँसी बिखर जाती है।

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और बूढ़े हो गए सोमप्रकाश को भी एक सनक हो गई है कि हर क़दम पर आज से तब की तुलना। लेकिन हाँ जो करते हैं वह मन ही मन। अब तो मन सदा चलायमान है। जितना ही शरीर अचल हुआ जा रहा है मन उतना ही गतिमान होता जा रहा है। लगातार वह 'अतीत' 'वर्तमान' और आने वाले  'भविष्य' के रास्ते पर दौड़ रहा है। इसीलिए आजकल वे कभी-कभी सोच लेते हैं कि क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि पोते को डाँट रहे हैं? अगर उसे डाँटोगे तो वह उसकी अधिकारिणी को महसूस नहीं होगा?

जबकि-उस ज़माने में एक बच्चे को सही मार्गदर्शन कराने का अधिकार सिर्फ घर के वयस्कों को ही था। यहाँ तक कि घर के पुराने नौकरों तक को।

और इसके बच्चे के माँ-बाप अपमानित महसूस नहीं करते थे।...उन्हें याद है, छोटे चाचा का एक कोई लड़का गुस्सा होता था तो बहुत हाथ-पाँव पटकता था। यह देखकर काम करने वाली बिन्दी बुआ ने उसके पैर पर गरम कलछुल

हल्के से छुला दिया था। फिर भी छाला पड़ गया था। इस पर छोटी चाची ने लाल-लाल मुँह बनाकर कहा था-'घर में क्या उसे उचित शिक्षा देने वाला और कोई नहीं बिन्दी बुआ?'

बिन्दी ने फटाक से उत्तर दिया था-'हैं तो सौ लोग फिर भी लड़का असभ्यता सीख रहा है। सिर्फ धमकाने ही से काम नहीं होता है छोटी बहूमाँ, छोटे बच्चे को अचानक ही दिल दहलाने वाली 'दवा' देते ही व्याधि सदैव के लिए खत्म हो जाती है। तुम्हारे इस खोका को ऐसी दवा दे दी है कि अब जिन्दगी में कभी भी किसी को लात नहीं मारेगा-देख लेना।'

अचानक अचानक ही ऐसी बातें याद आ जाती हैं तो सोमप्रकाश अतीत में खो जाते हैं।' नहाते वक्त शरीर पर तेल मलते-मलते अथवा खाना खाते-खाते।

सुकुमारी की नज़र पड़ जाती तो बोल उठतीं-'क्या हुआ? हाथ क्यों रोक लिया?'

सँभल जाते।

और सोचते। चश्मा बदलना होगा। साला सिर्फ 'दूर दृष्टि' से ही देखता है। इस 'चश्मा बदलने' वाली बात को एक बार सोमप्रकाश को उनके छोटे बेटे अमलप्रकाश ने कही थी। यद्यपि दूसरे अर्थ से।

कब कहा था? ओ ही, अपने ही बेटे की खीर चटाई के समय। सोमप्रकाश अपने देवकान्ति पोते का नाम रखना चाहते थे 'देवदूत'। पर एक बार में मना कर दिया था लड़के ने। कहा था-'रूबी कह रही थी, ये नाम तो अब हर घर में रख रहे हैं लोग। उसने एक सुन्दर सा नाम सोचकर रखा है।' लड़के माँ-बाप से बातें करते समय 'तुम्हारी बहूमाँ' नहीं कहते हैं। सीधे नाम लेकर बात करने का सीधा रास्ता अपनाते हैं। शुरु-शुरु में सोमप्रकाश चौंक उठा करते थे पर बाद में ठीक हो गया था।

ख़ैर, शिशु की माँ ने अगर खुद ही एक सुन्दर नाम सोच रखा है तो उसे मानना तो पड़ेगा ही। दादा का सोचा पुराने ज़माने का नाम ग्रहण करना थोड़े ही जरूरी है।

और वह नाम है 'किंशुक'।

यद्यपि बुलाने वाले नाम अट्हत्तर से अधिक होते हुए भी स्कूल के रजिस्टर में वही नाम है-'किंशुक सान्याल।'

सोमप्रकाश ने ज़रा हँसकर कहा था-'क्यों रे 'किंशुक' नाम का एक अर्थ है 'निर्गुण', जानता है न? कविता में कहते हैं 'निर्गुण किंशुक'।

अमल ने उस बात को झुठकारते हुए कहा था-'नाम में क्या कोई मतलब ढूँढ़ता है? या उसके कोई मतलब होते हैं? सुनने में सुन्दर होना चाहिए।'

सोमप्रकाश ने कहा था-'रखते समय नाम का मतलब नहीं देखोगे?'

'जरूरत क्या है? आप लोगों को अपना पुराना चश्मा बदलना चाहिए। और फिर ये नाम तो एक फूल का नाम भी है।'

सोमप्रकाश हँसने लगे थे। बोले-'वैसे तो घेंटू भी एक-फूल का नाम है।' लड़का नाराज़ होकर बोला-'बूढ़े हुये हैं जब से, आपमें एक बैड हैबिट देख रहा हूँ पिताजी...किसी न किसी बहाने हमारी या हमारे ज़माने की आलोचना करते हैं। ये सब है आपके घिसे-सड़े-गले पुराने चश्मे के कारण। चश्मा बदलना बहुत ज़रूरी है।'

बात उस समय सुनकर नई लगी थी। सोमप्रकाश ने सोचा, ओ: तो फिर कसूर आज के ज़माने के घिसे-सड़े-गले पृथ्वी का नहीं है, दोष है पुराने चश्में का। सोमप्रकाश ने सोचा था, हर युग में भाषा-भाव इत्यादि भी कितना बदल गया है। आख़िर इन लड़कों को तो उन्होंने ही पालकर बड़ा किया था और आज ये लोग उनके विपरीत हो गए हैं। कब ये लोग ऐसे हुए? कब घटी ये घटना?

अभी उसदिन तक तो हॉफ-पैन्ट पहनकर दोनों भाई छत पर दौड़-दौड़कर बैडमिंटन खेलते थे।...उससे भी पहले? और उसके बाद? हाँफ-पैन्ट से फुलपैन्ट में प्रोमोशन होने तक?

चलचित्र के चित्र की तरह अनेक चित्र आँखों के सामने तैरने लगे...

फिर उड़ते हुए धीरे-धीरे दूर खिसक जाते।

*                          *                         *

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