चश्में बदल जाते हैं - आशापूर्णा देवी Chasme Badal Jate Hain - Hindi book by - Ashapurna Devi
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चश्में बदल जाते हैं

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :103
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15408
आईएसबीएन :0000000000

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बाप बेटा को समझाना चाहता है कि युग बदल गया है-तुम्हारा चश्मा बदलना जरूरी है। वृद्ध पिता के चेहरे पर हँसी बिखर जाती है।

10

सोमप्रकाश क्या उसकी बातें सुन रहे थे? या कि एक प्रकाशबिन्दु से छिटक रहे रंगमशाल को निहार रहे थे? बच्चा अगर अपने रौं में बोल पाता है तो उसकी आँखें उसका चेहरा बोलता है। एक एक लकीरों से रौशनी छिटकती है।

उसी रौशनी को निहारते-निहारते लगा कि यहाँ, इस परिवेश में शायद अब कभी यह प्रकाश नहीं जलेगा। पड़ा रह जाएगा रंगमशाल की जली लकड़ी हू...स्मृति...स्मृति के सहारे गुजार देंगे इस घर के लोग, यहाँ के दरवाजे, खिड़कियाँ, दीवारें। इस घर के लोग भी खिड़की दरवाजों की तरह मूक दर्शकमात्र रह जायेंगे। न जाने कब तक शिथिल हुए बैठे थे सोमप्रकाश? देखते हुए? लड़का सहसा बोल उठा-'मामदू तुम्हारी आँखों में क्या बालू गिर गया है?'

'कहाँ? नहीं तो।'

'तब फिर तुम्हारे चश्मे के नीचे से आँसू क्यों बह रहे हैं?'

सोमप्रकाश मुस्कुराकर बोले-'चश्मा खराब हो गया है।'

उसने ज़रा ध्यान से देखने के बाद कहा-'तब तुम दूसरा चश्मा क्यों नहीं खरीदते हो? माँमोनी का चश्मा खराब हो गया था, डाक्टर के यहाँ से कितना सुन्दर चश्मा ले आई है। ओ, तुम तो डाक्टर के यहाँ नहीं जा सकोगे न? चल नहीं सकते हो। आहा बेचारे। तो मामदू डाक्टर बाबू को ही आने.. अरे बाप रे, बापी ऊपर आ गये हैं। जाता हूँ...' कहकर भागकर चला गया।  

राजा वसन्त राय रोड और राजा सुबोध मल्लिक रोड़, इन दोनों मोहल्लों के बीच की दूरी कितनी होगी? किलोमीटर में नापने पर कितना ही हो सकता है?

जबकि-कभी की इसी राजा सुबोध मल्लिक रोड़ की और आज राजा वसन्त राय रोड़ की सुनेत्रा को यह दूरी पार करने के लिए महीने दो महीने में एक बार भी समय नहीं मिलता था।

कैसे मिलता? समय कम पड़े तो? उसकी क्या घर-गृहस्थी नहीं है? उसी पर सारा घर निर्भर नहीं है क्या? लगभग दर्जन भर लोगों के साथ यह गृहस्थी?

हालाँकि जब वह सुबोध मल्लिक रोड से वसन्त राय में ट्रान्सफर हुई थी तब इतने लोग नहीं थे।

फिर भी आज सुनेत्रा अपने समस्त दायित्वों को तुच्छ मानकर सुबह ही चली आई है कभी के अपने जन्मगृह इसी सुबोध मल्लिक रोड में। और आते ही सीधे घुस गई सोमप्रकाश नामक व्यक्ति के कोने वाले कमरे में।

सुनेत्रा के दोनों नेत्रों में एक साथ आग और पानी दोनों था। सुनेत्रा के चेहरे का रंग एक ही साथ सुर्ख लाल भी और काला भी।

उसी मिश्रित दृश्य के साथ वह लगभग पछाड़ खाकर जा पहुँची-'पिताजी। मैंने कब तुम्हारा क्या अनिष्ट किया है जो बाप होकर तुमने मेरा इतना बड़ा सर्वनाश किया?'

सोमप्रकाश भी एक ही साथ विस्मित भी हुए और सिहर भी उठे।

अचानक क्या उनकी एकमात्र कन्या का सिर फिर गया है?

'क्या? क्या हुआ है बेटी?'

'तुम नहीं जानते हो क्या हुआ है?'

'मैं? मैंने तो कितने दिन हो गए तुझे देखा ही नहीं है रे।'

'मुझे नहीं देखा। पर मेरे प्राणपक्षी को तो देखा है और उसे पिंजड़े का द्वार खोलकर उड़ा दिया है।'

'सू! सूनी बेटी! क्या हुआ है मुझे जरा साफ-साफ समझाकर बता। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।'

'वह तो होगा ही। इतना बड़ा अन्याय करके दिमाग ठीक रख पाना क्या सम्भव है?'

'सूनी! तेरे साथ कोई आया है?'

'क्या कहा पिताजी? मेरे साथ कोई आया है या नहीं? कभी किसी समय मैं अकेली आई हूँ क्या? अगर उस बात की आदत रहती तो क्या बीच-बीच में बूढ़े माँ-बाप को आँखों से देखने न आ जाती? और अकेले आना भी चाहूँ तो मुझे कोई आने देगा? जो सर्वदा साथ आता है वही आया है।'

'ओ दामाद। अभिमन्यु? तो वह है कहाँ?'

'माँ के कमरे में। आते ही माँ को ऐसा भला-बुरा सुना रहा है कि मैं वहाँ खड़ी न रह सकी।'

सोमप्रकाश हताशभाव से बोले-'सूनी! मैं किसी हालत में नहीं समझ पा रहा हूँ कि घटना क्या घटी है। हमने तुम लोगों का क्या बिगाड़ा है?'

सूनी आँचल से नाक-मुँह-आँख पोंछकर उत्तर देने के लिए तैयार हुई पर उत्तर उसे देना नहीं पड़ा। एक छाया आकर दरवाजे के सामने खड़ी हुई। और उसी छाया ने गमकती आवाज में कहा-'कुछ खास नहीं किया है। सिर्फ हमारे भविष्य के सहारे को, हमारे समस्त परिवार के शिवरात्रि के दीए को, मेरी बूढ़ी माँ की अंधी की लाठी को, अपने हाथों से टिकट खरीद कर जहज़म के रास्ते छोड़ दिया है।'

'अभिमन्यु! मेरा सिर चकरा रहा है। समझ में नहीं आ रहा है कि मेरा दिमाग क्या खराब हुआ जा रहा है? दुहाई है मुझे तुमलोग सारी बाते साफ-साफ बताओ बेटा...'

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