Pyar Ka Chehara - Hindi book by - Ashapurna Devi - प्यार का चेहरा - आशापूर्णा देवी
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प्यार का चेहरा

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :102
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15403
आईएसबीएन :000

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नारी के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास....

24

भोला मामा से गपशप सुनकर आने के बाद मां उसी तरह की मुसीबत में डाल देती सागर को। कहती, “कह, सुनू तुम लोगों के भोला मामा ने क्या गपशप सुनाया।”

सागर के सौभाग्य से उस वक्त उसके बड़े भाई ने प्रवेश किया। बोला, "मां, क्या कर रही हो? आम काट रही हो? किसी और को देना हो तो दी, मुझे नहीं देना।"

"अरे, यह क्या? तू तो बड़े प्रेम के साथ खाता था।”

“इसीलिए तो प्रेम का नतीजा भुगत रहा हूं। आम खाते-खाते इन कई दिनों के दरम्यान तोंद निकल आयी है।”

नानी दालान के कोने में उठाकर रखे चूल्हे पर परांठे सेंक रही भीं। यह उनका विशुद्ध डिपार्टमेन्ट है, किसी दूसरे को छूने का अधिकार नहीं है। खुद बेल भी रही हैं और सेंक भी रही हैं। सागर की मां जाकर एक थाली रख आयी है, नानीं उस पर गरम परांठे डालती जा रही हैं। मछली पहले ही रांध ली गई है। नानी ने-दोपहर में स्नान करने के पहले ढंककर रख दिया है। लड़की को रांधने नहीं देती, कती हैं, “तू कुछेक दिनों के लिए आयी है और खुद पकाकर खाएगी। दिमाग खराब है क्या ! तेरे दादा के लिए नियमित तौर पर मुझे मछली नहीं रांधनी पड़ती है? तेरी दादी को एक वक्त न मिले तो काम चल जाता है मगर दादा के लिए बनानी ही पड़ती है।”

लेकिन हर दिन नियमित तौर पर इसका जुगाड़ कौन करता है? इन स्थानों में नियमित तौर पर जुगाड़ करना आसान नहीं है। किसी दिन बाजार में बहुत ज्यादा आ जाती है तो फिर दो दिन तक मिलती ही नहीं।

अरुणेन्द्र के अलावा और कौन ऐसा व्यक्ति है जो जुगाड़ कर सकता है?

चाहे जहां से भी हो, लाकर देते ही हैं।

तो भी नानी खोट निकालने में बाज नहीं आतीं।

"इतनी कांटेदार मछली ले आए? जानते ही हो कि खानेवाले सिर्फ दो बूढ़ा-बूढ़ी ही हैं।"

एक दिन भी यह नहीं कहतीं, “आज की मछली अच्छी हैं, मन लगाकर बनाई हैं, तुम दो अदद खा लो।”

चिनु ने कई दिन कहा था, “अरुण चाचा इतना काम-धाम कर देते हैं, उन्हें कभी-कभार यहां खाना खाने के लिए कहो, मां। विधुर आदमी हैं, उनकी लड़की क्या खाना पकाती है, क्या खिलाती है, ईश्वर ही जाने !"

नानी ने खुलकर हंसते हुए कहा, “मुझे मालूम है। हर रोज मसूर की दाल, आलू का भुरता और आलतू-फालतू चच्चड़ी (कई प्रकार की सब्जियों की डंठलों को मिलाकर पकाया गया व्यंजन विशेष)।”

"हाय, मां ! फिर तो बीच-बीच में...."

नानी उसी तरह निर्मोही के स्वर में कहती है, “बीच-बीच में किसी दिन खिलाने से उसका दुःख दूर हो जाएगा? सभी ने तो उस

वक्त कहा था, कौन तुम्हारे घर-संसार की देखभाल करेगा, फिर से शादी कर लो, लेकिन अनसुना कर दिया।”

सागर कहानी की किताब पढ़ते हुए सारी बातें सुन रहा था। बोल पड़ा था, “अहा, तो फिर लतू की तरह ही सौतेली मां घर में आ जाएगी। यह क्या कोई अच्छी बात है?

नानी मृण्मयी देवी विनोद के लहजे में बोली थीं, “कम-से-कम लतू के बाप के लिए कुछ बुरा तो नहीं हुआ।”

"एक व्यक्ति के लिए अच्छा होना ही क्या सब कुछ है?”

"सबका अच्छा होना किस व्यवस्था के तहत होगा, सागर? कथामाला' की कहानी तूने पढ़ी नहीं है?”

इन सब बातों के दौरान निमन्त्रण की बात गौण होती जा रही थी, चिन्मयी दुबारा उसी बिन्दु पर आते हुए बोली, "ऐसा करके अरुण चाचा ने अपने बड़प्पन का ही परिचय दिया है। जन्म से ही रोगी पत्नी की जी-जान से सेवाजतन करते रहे, फिर भी उनके मरने के बाद शादी नहीं की। पचास साल का आदमी भी शादी करता है। बहरहाल, अपने लोगों को चाहिए कि थोड़ा-बहुत जतन करें क्योंकि वे भी तो जी-तोड़ मेहनत करते आ रहे हैं।”

मृण्मयी देवी चकला-बेलन ठकठकाते हुए, खिलखिलाकर हंसते हुए कहती हैं, “तुझे यदि इच्छा हो रही है तो निमन्त्रित कर। कहूंगी, चिनु वयस्क-अभिज्ञ गृहिणी हो गई है, ससुराल से आयी है, चिनु की इच्छा है..."

"सो तो अच्छी बात है।"

लेकिन अरुणेन्द्र को वह स्नेह-यत्न स्वीकार करने का अवकाश ही नहीं मिला। सिर्फ कहते हैं, “होगा, होगा, किसी दिन होगा, तू तो अभी रहेगी ही।"

मृण्मयी देवी कहती हैं, “उसकी बात रहने दे। वह उसी तरह का है। तुम लोगों की ताई तो जन्म से ही रोगी थी, सेवा-जतन हीं करता रहा है, सेवा-जतन का कभी आस्वादन नहीं कर सका है। सेवाजतन वरदाश्त नहीं कर पाता है। पत्नी के मरने के बाद से और अधिक महान पुरुष बन गया है।

"खुद भी थोड़ा-बहुत रसोई के काम की देखरेख कर सकते हैं।”

“वह सामर्थ्य है ही कहाँ? अगर ऐसा करेगा तो दुनियाभर के लोगों की बेगार कौन करेगा?"

चिनु दुःखभरे स्वर में कहती है, "जबकि कहा जा सकता है कि इसी घर का आदमी है।”

यानी इसी घर में रहने को कहा जाता तो उचित होता।

मृण्मयी देवीं शायद उस कथन का सूत्र थामते हुए ही कहती हैं, “हां, उनके दादा और मेरे ददिया ससुर सहोदर भाई थे। पर एकदूसरे का चेहरा देखना भी पसन्द नहीं करते थे, उस सिलसिले को हमीं लोगों ने तोड़ा हैं।”

"तो जरा और तोड़ सकती हो..." चिनु हंस देती है, “गृहस्थी के नाम पर तो चाचा और उनकी बारह-तेरह साल की लड़की है।”

“बड़-बड़ मत कर, चिनु। नहर काटकर मगर लाने का मुझे शौक नहीं है।" चिनु मन-ही-मन सोचती है-मां इस तरफ तो काफी उदार है, लेकिन सगोत्र के लोगों के प्रति संकीर्ण चित्त की है। उसके बाद कहती है, “लड़की कभी यहां आती नहीं है। मातृहीन लड़की ! सरकार की लड़की फिर भी बुआ से लाड़-प्यार पाने के कारण अच्छी है। मुहल्ले भर का चक्कर काटती रहती है। पर कई दिनों से नहीं आ रही है।

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