प्यार का चेहरा - आशापूर्णा देवी Pyar Ka Chehara - Hindi book by - Ashapurna Devi
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प्यार का चेहरा

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :102
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15403
आईएसबीएन :000

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नारी के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास....

23

थोड़ी देर बाद विनयेन्द्र खामोशी में डूब जाते हैं और जब वे लोग ऊबड़-खाबड़ रास्ता छोड़ एक समतल रास्ते पर पहुंचते हैं, विनयेन्द्र अचानक सागर की पीठ थपथपाते हुए कहते हैं, “क्यों नाती साव, खूब घबरा गए हो न? सोच रहे होगे कि एक पागल बूढ़े के शिकंजे में फंस गया हूं।"

सागर अधिक बोल नहीं पाता है। सिर्फ कहता है, “धत्त !”

विनयेन्द्र हंसकर कहते हैं, तो फिर कहना पड़ेगा कि तुम बड़े ही साहसी हो। घबराने वाली ही बात है। यह बूढ़ा घुमने-फिरने के नाम पर तुम्हें संथाली बस्ती में घुमाने-फिराने लगा, कितने ही मूरख आदिवासियों की बातचीत सुनवाई और उसके बाद नदी के चर पर खींचते हुए लाकर लेक्चर झाड़ने लगा। कौन नहीं घबराएगा भला?”

सागर अब साहस बटोरता है।

सागर तीव्र प्रतिवाद करता है, “मैं तनिक भी घबराया नहीं हूँ।”

घबराए नहीं हो? यह अच्छो बात है। लेकिन उस दिन 'पिशाच की पुकार से बेहद घबरा गए थे। कहो, ठीक कह रहा हूँ न? असलियत क्या है, जानते हो? कुसंस्कार’ मनुष्य का मौलिक उपकरण है, शायद वह अत्यन्त गहरे में रहता है, और पूरी मात्रा में रहता है। दूसरे किसी व्यक्ति की मूर्खता और कुसंस्कार का अंधविश्वास वहां जाकरे धक्का मारता है तो चेतना के गहरे स्तर से वह आदिम चेतना उठकर ऊपर चली आती है, जिसकी एकमात्र प्रतिक्रिया है भय। कुसंस्कार को कुसंस्कार के रूप में पहचानना सीख ले तो भय की मात्रा कम हो जाती है।...तुम्हें इतनी बात कहने की इच्छा क्यों हो रही है, जानते हो? देखा, तुम्हारे अन्दर सरलता और विश्वास है। तुम्हारे जैसा एक शागिर्द पाने की इच्छा होती है, समझे? सोचता हूं, मन के अन्दर जो सब बातें उठती हैं, उन्हें किसी को बताना होगा।"

सागर एकाएक बच्चे की तरह एक बात कह बैठता है। कहता है, "आप तो बहुत बड़ी नौकरी करते थे, साहब की तरह ठाट-बाट से रहते थे, इस तरह रहना आपको अच्छा लगता है?"  

अन्तर से छलककर एक उदात्त हंसी की आवाज उन्मुक्त प्रकृति के शरीर पर फैल जाती हैं। वह आवाज बहुत देर तक वायु में तरंगित होती रहती है।

विनयेन्द्र दुबारा उसकी पीठ पर हौले से एक धौल जमाते हुए कहते हैं, "मुझे देखकर तुम्हें क्या लगता है? अच्छा नहीं लगता हो?"

"नहीं, वैसी बात नहीं है।"

उन्हें देखकर सागर को लगता है कि वे आनन्द की मूत हैं। यह आनन्द किस चीज़ को है? यह 'अच्छा लगना' कहां से आता है? अच्छा लगने का उपकरण क्या है?''‘सुबह के वक्त गम का बूट पहन किसानों की तरह खेत में काम करते हैं, जहा ढेर सारे मेंढक-केंचुए घूमते हैं, सांप का होना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

दोपहर में किसानों की तरह ही तालाब में डबकी लगाकर स्नान करते हैं, जैसाकि सागर की नानी के घर को कोई भी नहीं करता। तालाब का पानी कोई छूता तक नहीं, ट्यूबवेल से ही सारा कुछ करते हैं। तालाब में नहाने के बाद कोई रहम कर खाना पकाकर दे जाता है तो वही खाते हैं और तीसरे पहर मीलों पैदल चलकर आदिवासी, देहाती और संथालों की बस्तियों का चक्कर लगाते हुए उन लोगों के सुखदुःख की बातें सुनते हैं, उन्हें मुफ्त में दवा देते हैं और रात में फिर किसी के द्वारा दी गई रोटी-सब्जी खाकर सो जाते हैं। यह तो है। उनकी हालत ! ऐसा जीवन क्योंकर अच्छा लग सकता है? सच्चाई तो यह है कि आदिवासियों तक को ऐसा जीवन अच्छा नहीं लगता, वे अपने बाल-बच्चों को स्कूल भेजते हैं जिससे कि वे भी भविष्य में खेतों के कीचड़ में काम न कर अच्छा काम कर सकें।...लेकिन वे...

इस अच्छा लगने का उत्स क्या है, सागर सोचने लगता है।

सागर की मां जो कहती है कि सागर भावुक है, लिखाई-पढ़ाई के मामले में अपने बड़े भाई की तरह चौकस नहीं है, यह सही है।

सागर के मन के पास जो कुछ भी नया आता है, उसकी तरंग। उठती है सागर के अन्दर। सागर उसका कार्य-कारण सोचने बैठता है। सागर के मन में सहज हो हिलकोरे जगने लगती हैं।

साहब दादू उसे घर के दरवाजे तक पहुंचा आते हैं लेकिन उसके बाद भी सागर सोचता ही रहता है।

चिनु खाना परोस हड़बड़ाकर आती है, “देख रही हूं, यहां आकर सुर्खाब के पर उग आए हैं। बाहर निकलता है तो पांच घंटे तक आने का नाम ही नहीं लेता। आज फिर कौन-सा पिचाच बुलाकर ले गया था?”

सागर ऊब भरी निगाह से ताकता है, "जो जी में आता है, बकती क्यों हो? साहब दादू के साथ गया थ।"

“ओह, यह बात है ! पहले ही बताना चाहिए था।" चिनु को शर्म का अहसास होता है, उनके साथ जो भी जितनी देर तक रहेगा, उसको उतना ही लाभ होगा।  

"ऐसे व्यक्ति को उसके नजदीकी रिश्तेदार समझ नहीं सकें।”

सागर ने तेज आवाज में कहा, “तुम लोग तो समझते हो !”

"हमारे समझने से क्या होगा?" चिनु निराशा की लंबी सांस लेती है, “असली लोग समझे तब तो?”

"असली-नकली नामक कोई चीज़ नहीं है...." सागर घोषणा जैसी भंगिमा के साथ कहता है, “साहब दादू ने बताया है।"

“अन्मगत रिश्ते को ही सामाजिक रिश्ता मानकर अपने-पराये का गणित हल नहीं किया जा सकता है। अभिरुचि और प्रकृति का मेल और बेमेल ही अपने-पराये का गणित है। तुम मुझे समझ रहे हो तो तुम मेरे आत्मीय हो और न समझ पाते हो तो पराये हो।”

"बाप रे !"

चिनु गाल पर हाथ रखती हैं, “तुझे इतनी सारी बातें कही हैं?” "सिर्फ इतना ही क्यों?"

सागर गंभीर स्वर में कहता है, “और भी ढेर सारी बातें।”

यह कहकर ही सावधान हो जाता है सागर। और ज्यादा कहेगा तो हो सकता है मां चटाई बिछाकर बैठ जाए और कहे, “बैठ जा, और क्या-क्या कहा?”

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