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हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15402
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

दस महाविद्या

तंत्र ग्रंथों में इस सृष्टि के कारण और कार्य की व्याख्या अपने ही ढंग से की गई है। अद्वैत दर्शन में जिसे 'ब्रह्म' कहा गया है, वही यहां 'शिव' के नाम से संबोधित है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, चंद्र, सूर्य, दिशा, काल तथा जीवात्मा - ये दश तत्व शिव के रूप हैं और इनमें समाहित शक्तियां ही क्रमशः दश महाविद्याएं हैं। वस्तुतः रुद्र तो दश ही हैं, ग्यारहवां तो आत्मा है - दश ते वायवः प्रोक्ता आत्मा चैकादश स्मृतः। कुछ विद्वान भगवान श्री विष्णु के दशावतारों की शक्तियों के रूप में दश महाविद्याओं का संबंध जोड़ते हैं-

कृष्णस्तु कालिका साक्षात् राममूर्तिश्च तारिणी।
वराहो भुवना प्रोक्ता नृसिंहो भैरवीश्वरी॥
धूमावती वामनः स्याच्छिन्ना भृगुकुलोद्भवः।
कमलाव मत्स्यरूपः स्यात् कूर्मस्तु बगलामुखी॥
मातंगी बौद्ध इत्येषा षोडशी कल्कि रूपिणी।

अर्थात कृष्ण साक्षात कालिका हैं, तारा रामरूपिणी हैं, वराह भुवनेश्वरी हैं, नृसिंह त्रिपुर भैरवी हैं, धूमावती वामन हैं, छिन्नमस्ता परशुराम हैं, कमला मत्स्य हैं, कूर्म बगलामुखी हैं, मातंगी बुद्ध हैं और षोडशी कल्कि हैं। अर्थात एक ही तत्व उपासना भेद से भिन्न-भिन्न दिखाई पड़ रहा है।

इस प्रकार तंत्र शास्त्रों में परोक्ष और अपरोक्ष रूप से इन्हीं दश महाविद्याओं की उपासना का विधान है जो भुक्ति एवं मुक्ति–दोनों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाली हैं। यहां उन्हीं की क्रमशः जानकारी दी जा रही है-

काली

दस महाविद्याओं में भगवती काली प्रथम हैं। 'महाभागवत' के अनुसार महाकाली ही मुख्य हैं। उन्हीं के उग्र और सौम्य-दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविद्याएं हैं। विद्यापति भगवान शिव की ये शक्तियां अर्थात महाविद्याएं अनंत प्रदान करने में समर्थ हैं। दार्शनिक दृष्टि से भी कालतत्व की प्रधानता सर्वोपरि है। इसलिए महाकाली या काली ही समस्त विद्याओं की आदि हैं अर्थात उनकी विद्यामय विभूतियां ही महाविद्याएं हैं।

ऐसा लगता है कि महाकाली की प्रियतमा काली ही अपने दक्षिण और वाम रूपों से दस महाविद्याओं के नाम से विख्यात हुईं। 'बृहन्नील तंत्र' में कहा गया है कि रक्त और कृष्ण भेद से काली ही दो रूपों में अधिष्ठित हैं। कृष्णवर्णा का नाम 'दक्षिणा' और रक्तवर्णा का नाम ‘सुंदरी' है।

‘कालिका पुराण' में एक कथा है-एक बार हिमालय अवस्थित मतंग मुनि के आश्रम में जाकर देवताओं ने महामाया की स्तुति की। स्तुति से प्रसन्न होकर मतंग वनिता के रूप में भगवती ने देवताओं को दर्शन दिया और पूछा कि तुम लोग किसकी स्तुति कर रहे हो। उसी समय देवी के शरीर से काले पहाड़ के समान वर्ण वाली एक दिव्य नारी का प्राकट्य हुआ। उस महातेजस्विनी ने स्वयं ही देवताओं की ओर से उत्तर दिया कि ये लोग मेरा ही स्तवन कर रहे हैं। वे काजल के समान कृष्णा थीं, इसलिए उनका नाम 'काली' पड़ा।

'दुर्गा सप्तशती' के अनुसार एक बार शुंभ-निशुंभ के अत्याचार से व्यथित होकर देवताओं ने हिमालय पर जाकर 'देवी सूक्त' से देवी की स्तुति की। तब गौरी की देह से कौशिकी का प्राकट्य हुआ। कौशिकी से अलग होते ही पार्वती का स्वरूप कृष्ण हो गया जो 'काली' के नाम से विख्यात हुईं।

काली को नील रूपा होने के कारण 'तारा' भी कहते हैं। 'नारद पाञ्चरात्र' के अनुसार एक बार काली के मन में आया कि वे पुनः गोरी हो जाएं। सोचकर वे अंतर्धान हो गईं। शिव जी ने नारद जी से उनका पता पूछा। नारद जी ने सुमेरु के उत्तर में देवी के प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात कही। शिव जी की प्रेरणा से नारद जी वहां गए। उन्होंने देवी से शिव जी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। यह सुनकर देवी क्रुद्ध हो गईं। तब उनकी देह से एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट हुआ और उससे छायाविग्रह त्रिपुर भैरवी का प्राकट्य हुआ।

काली की उपासना में संप्रदायगत भेद है। शक्ति साधना के दो पीठों में काली की उपासना श्याम पीठ पर करने योग्य है। भक्ति मार्ग में तो किसी भी रूप में उन महामाया की उपासना फलप्रद है। साधना के द्वारा साधक में पर्ण शिशुत्व का उदय हो जाता है तब काली का श्रीविग्रह साधक के समक्ष प्रकट होता है। तांत्रिक मार्ग में यद्यपि काली की उपासना दीक्षागम्य है तथापि शरणागति के द्वारा उनकी कृपा किसी को भी प्राप्त हो सकती है। भक्ति भाव से मंत्र-जप, पूजा, होम और पुरश्चरण करने से भगवती काली प्रसन्न हो जाती हैं। उनकी प्रसन्नता से साधक को सहज ही संपूर्ण अभीष्टों की प्राप्ति होती है।

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