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शिवपुराण भाग-1

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :832
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 14
आईएसबीएन :0

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शिवपुराण सरल हिन्दी भाषा में पढ़ें

अध्याय ३-४

साध्य-साधन आदि का विचार तथा श्रवण, कीर्तन और मनन - इन तीन साधनों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन

व्यासजी कहते हैं- सूतजी का यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले-'अब आप हमें वेदान्तसार-सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराण- की कथा सुनाइये।'

सूतजी ने कहा- आप सब महर्षिगण रोग शोक से रहित कल्याणमय भगवान् शिव का स्मरण करके पुराणप्रवर शिवपुराण की, जो वेद के सार-तत्त्व से प्रकट हुआ है, कथा सुनिये। शिवपुराण में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य - इन तीनों का प्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदान्तवेद्य सद्वस्तु का विशेषरूप से वर्णन है। इस वर्तमान कल्प में जब सृष्टिकर्म आरम्भ हुआ था, उन दिनों छ: कुलों के महर्षि परस्पर वाद-विवाद करते हुए कहने लगे-'अमुक वस्तु सबसे उन्क्रष्ट है और अमुक नहीं है।' उनके इस विवाद ने अत्यन्त महान् रूप धारण कर लिया। तब वे सब-के-सब अपनी शंका के समाधान के लिये सृष्टिकर्ता अविनाशी ब्रह्माजी के पास गये और हाथ जोड़कर विनय भरी वाणी में बोले-'प्रभो! आप सम्पूर्ण जगत को धारण-पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणों के भी कारण हैं। हम यह जानना चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्त्वों से परे परात्पर पुराणपुरुष कौन हैं?'

ब्रह्माजी ने कहा- जहाँ से मनसहित वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है तथा जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदि से युक्त यह सम्पूर्ण जगत्‌ समस्त भूतों एवं इन्द्रियों के साथ पहले प्रकट हुआ है वे ही ये देव, महादेव सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण जगत्‌ के स्वामी हैं। ये ही सबसे उत्कृष्ट हैं। भक्ति से ही इनका साक्षात्कार होता है। दूसरे किसी उपाय से कहीं इनका दर्शन नहीं होता। रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्तिभाव से उनका दर्शन करना चाहते हैं। भगवान् शिव में भक्ति होने से मनुष्य संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है। देवता के कृपाप्रसाद से उनमें भक्ति होती है और भक्ति से देवता का कृपाप्रसाद प्राप्त होता है - ठीक उसी तरह, जैसे यहाँ अंकुर से बीज और बीज से अंकुर पैदा होता है। इसलिये तुम सब ब्रह्मर्षि भगवान् शंकर का कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिये भूतलपर जाकर वहाँ सहस्रों वर्षों तक चालू रहने वाले एक विशाल यज्ञ का आयोजन करो। इन यज्ञपति भगवान् शिव की ही कृपा से वेदोक्त विद्या के सारभूत साध्य-साधन का ज्ञान होता है।

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