शिवपुराण - हनुमानप्रसाद पोद्दार Shivpuran - Hindi book by - Hanuman Prasad Poddar
लोगों की राय

गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिवपुराण

शिवपुराण

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1190
आईएसबीएन :81-293-0099-0

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

100 पाठक हैं

भगवान शिव की महिमा का वर्णन...

'शिवपुराण' एक प्रमुख तथा सुप्रसिद्ध पुराण है जिसमें परात्पर परब्रह्म परमेश्वर के 'शिव'  (कल्याणकारी) स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा एवं उपासना का सुविस्तृत वर्णन है। भगवान् शिव मात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु वे पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर हैं एवं निगमागम आदि सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं। वेदों ने इस परमतत्त्व को अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वप्रपंच का स्रष्टा, पालक एवं संहारक कहकर उनका गुणगान किया है। श्रुतियों ने सदाशिव को स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरों के भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है। 'शिव' का अर्थ ही है-'कल्याणस्वरूप' और 'कल्याणप्रदाता'। परमब्रह्म के इस कल्याणरूप की उपासना उच्चकोटि के सिद्धों, आत्मकल्याणकामी साधकों एवं सर्वसाधारण आस्तिक जनों-सभी के लिये परम मंगलमय, परम कल्याणकारी, सर्वसिद्धिदायक और सर्वश्रेयस्कर है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व ही नहीं, अपितु ब्रह्मा-विष्णु तक इन महादेव की उपासना करते हैं। भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के तो ये परमाराध्य ही हैं।

यह सर्वविदित तथ्य है कि प्राचीनकाल से ही शिवोपासना का प्रचार-प्रसार एवं बाहुल्य मात्र भारत के सभी प्रदेशों में ही नहीं, अपितु न्यूनाधिकरूप से सम्पूर्ण विश्व में भी होता आ रहा है।

शिव के इस लोककल्याणकारी, आराध्य-स्वरूप, महत्त्व एवं उपासना-पद्धति से सर्वसाधारण- जन को परिचित कराने के उद्देश्य से गीताप्रेस ने सन् १९६२ ई० में 'कल्याण' हिन्दी-मासिक पत्र के ३६वें वर्ष के विशेषांक के रूप में 'संक्षिप्त शिवपुराणांक' (शिवपुराण का संक्षिप्त हिन्दी-रूपान्तर) सर्वप्रथम प्रकाशित किया था।

इसमें पुराणानुसार शिवतत्त्व के विशद विवेचन के साथ शिव-अवतार, महिमा तथा लीला-कथाओं के अतिरिक्त पूजा-पद्धति एवं अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद गम्भीर तथा रोचक एवं प्रेरणादायी कथाओं का भी सुन्दर संयोजन है। सभी श्रद्धालु आस्तिक जनों एवं जिज्ञासु सज्जनों को इस दुर्लभ और उपादेय ग्रन्थ का अनुशीलन कर अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिये।

- प्रकाशक



आगे....

विनामूल्य पूर्वावलोकन

Prev
Next
Prev
Next

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book