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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिवपुराण

शिवपुराण

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1190
आईएसबीएन :81-293-0099-0

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भगवान शिव की महिमा का वर्णन...


गौ आदि बारह वस्तुओं का चैत्र आदि बारह महीनों में क्रमश: दान करना चाहिये। गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चाँदी, नमक, कोंहड़ा और कन्या- ये ही वे बारह वस्तुएँ हैं। इनमें गोदान से कायिक, वाचिक ओर मानसिक पापों का निवारण तथा कायिक आदि पुण्यकर्मों की पुष्टि होती है। ब्राह्मणो! भूमि का दान इहलोक और परलोक में प्रतिष्ठा (आश्रय) की प्राप्ति करानेवाला है। तिल का दान बलवर्धक एवं मृत्यु का निवारक होता है। सुवर्ण का दान जठराग्नि को बढ़ानेवाला तथा वीर्यदायक है। घी का दान पुष्टिकारक होता है। वस्त्र का दान आयु की वृद्धि करानेवाला है ऐसा जानना चाहिये। धान्य का दान अन्न-धन की समृद्धि में कारण होता है। गुड़ का दान मधुर भोजन की प्राप्ति करानेवाला होता है। चाँदी के दान से वीर्य की वृद्धि होती है। लवण का दान षड्‌रस भोजन की प्राप्ति कराता है। सब प्रकार का दान सारी समृद्धि की सिद्धि के लिये होता है। विज्ञ पुरुष कूष्माण्ड के दान को पुष्टिदायक मानते हैं। कन्याका दान आजीवन भोग देनेवाला कहा गया है। ब्राह्मणो! वह लोक और परलोक में भी सम्पूर्ण भोगों की प्राप्ति करानेवाला है। विद्वान् पुरुष को चाहिये कि जिन वस्तुओं से श्रवण आदि इन्द्रियों की तृप्ति होती है, उनका सदा दान करे। श्रोत्र आदि दस इन्द्रियों के जो शब्द आदि दस विषय हैं, उनका दान किया जाय तो वे भोगों की  प्राप्ति कराते हैं तथा दिशा आदि इन्द्रिय देवताओं (श्रवणेन्द्रिय के देवता दिशाएँ, नेत्र के सूर्य, नासिका के अश्विनीकुमार, रसनेन्द्रिय के वरुण, त्वगिन्द्रिय के वायु, वागिन्द्रिय के अग्नि, लिंग के प्रजापति, गुदा के मित्र, हाथों के इन्द्र और पैरों के देवता विष्णु हैं।) को संतुष्ट करते हैं। वेद और शास्त्र को गुरुमुख से ग्रहण करके गुरु के उपदेश से अथवा स्वयं ही बोध प्राप्त करने के पश्चात् जो बुद्धि का यह निश्चय होता है कि 'कर्मों का फल अवश्य मिलता है', इसी को उच्चकोटिकी 'आस्तिकता' कहते हैं। भाई- बन्धु अथवा राजा के भय से जो आस्तिकता- बुद्धि या श्रद्धा होती है, वह कनिष्ठ श्रेणी की आस्तिकता है। जो सर्वथा दरिद्र है, इसलिये जिसके पास सभी वस्तुओं का अभाव है वह वाणी अथवा कर्म (शरीर) द्वारा यजन करे। मन्त्र, स्तोत्र और जप आदि को वाणी द्वारा किया गया यजन समझना चाहिये तथा तीर्थयात्रा और व्रत आदि को विद्वान् पुरुष शारीरिक यजन मानते हैं। जिस किसी भी उपाय से थोड़ा हो या बहुत, देवतार्पण- बुद्धि से जो कुछ भी दिया अथवा किया जाय, वह दान या सत्कर्म भोगों की प्राप्ति कराने में समर्थ होता है।

तपस्या और दान- ये दो कर्म मनुष्य को सदा करने चाहिये तथा ऐसे गृह का दान करना चाहिये, जो अपने वर्ण (चमक दमक या सफाई) और गुण (सुख-सुविधा) से सुशोभित हो। बुद्धिमान् पुरुष देवताओं की तृप्ति के लिये जो कुछ देते हैं, वह अतिशय मात्रा में और सब प्रकार के भोग प्रदान करनेवाला होता है। उस दान से विद्वान् पुरुष इहलोक और परलोक में उत्तम जन्म और सदा सुलभ होने वाला भोग-पाता है। ईश्वरार्पणबुद्धि से यज्ञ-दान आदि कर्म करके मनुष्य मोक्ष-फल का भागी होता है।

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