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सरल शब्दों में महान दार्शनिक की संक्षिप्त जीवनी- मात्र 12 हजार शब्दों में…
हाय ! पुच्छल तारा !!
जन साधारण की धारणा है कि पुच्छल तारे का दिखाई देना या उल्कापात होना किसी प्राकृतिक विपत्ति की पूर्व सूचना होती है। अरस्तू ने अपने जीवन काल में कई बार पुच्छल तारों को उदय होते देखा। पहला तो ईसा पूर्व 373-72 में एकिया के भूकंप के पहले दिखाई दिया था, दूसरा कोरिंथ के तूफान के पहले ईसा पूर्व 341-40 दिखा था। इन निरीक्षणों के आधार पर अरस्तू ने भी पुच्छल तारे का दिखाई देना अशुभ माना था परंतु वह इसके ग्रह या नक्षत्र होने का समर्थन नहीं करता था। उसका कहना था कि तारे टूटने की भांति ही गैस के जलने से पुच्छल तारा भी बन जाता है। अंतर यह है कि ताप अधिक होने के कारण यदि गैस जलने की प्रक्रिया शीघ्र समाप्त हो जाती है तो तारा टूटता हुआ मालूम होता है। यही क्रिया मंद गति से होने पर पुच्छल तारा बन जाता है।
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