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सरल शब्दों में महान दार्शनिक की संक्षिप्त जीवनी- मात्र 12 हजार शब्दों में…
सहृदय यथार्थवादी
सुकरातकालीन एथेंसवासी नाटककार यूरीपिडीज (ईसा पूर्व 486-406) ने लिखा था-
दासता,
जो बुराई की चीज है
अपनी प्रकृति से ही बुराई है
मनुष्य से वह अर्पित करवाती है
जिसका समर्पण उसे नहीं करना चाहिए।
लगभग एक शताब्दी बाद अरस्तू ने यह दावा करते हुए दासता को उचित ठहराया कि कुछ लोग दास इसलिए बन जाते हैं क्योंकि उनकी प्राकृतिक रुचि नीच वृत्ति की होती है। हां, वे यह नहीं बता सके कि सभी नीच वृत्ति के लोग दास क्यों नहीं बन जाते! प्रजातंत्र की अपेक्षाएं बताते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि वे तमाम व्यक्ति जो मत देने की बुद्धि न रखते हों उन्हें दासों की श्रेणी में डाल देना चाहिए। तत्समय स्त्रियों के अतिरिक्त दासों को भी मत देने का अधिकार नहीं था। लेकिन अपनी मृत्यु से पूर्व अपनी संपत्ति का एक भाग अपने दासों को दे दिया ताकि वे मुक्त जीवन जी सकें और फिर न बेचे जा सकें।
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