शब्द का अर्थ
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ताल :
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पुं० [सं० तल+अण्] १. हाथ की हथेली। कर-तल। २. [√तड्+णिच्+अच्, ड–ल] हथेलियों के आघात के उत्पन्न होने वाला शब्द। करतल-ध्वनि। ताली। ३. संगीत में समय का परिमाण ठीक रखने के लिए थोड़े-थोड़े, परन्तु नियत अंतर में हथेली या और किसी चीज से किया जानेवाला आघात। ४. संगीत में उक्त प्रकार के आघातों का क्रम, मान्, संख्या आदि स्थिर रखने के लिए कुछ निश्चित आघातों का (जिनमें से प्रत्येक ‘आघात्’, मात्रा कहलाता है) अलग और विशिष्ट वर्ग या समूह। जैसे–तीन मात्राओं का ताल, पाँच मात्राओं का ताल आदि। ५. संगीत में तबले, मृदंग, ढोल आदि बजाने का कोई विशिष्ट प्रकार जो उक्त अनेक तालों के योग से बना और किसी विशिष्ट राग या लय के विचार से स्थिर किया गया हो। जैसे–चौताल, झूमर रुद्र या रूपक ताल। मुहावरा–ताल देना-गाने-बजाने के समय, कालमान ठीक रखने के लिए राग-रागिनी आदि के अनुरूप विशिष्ट प्राकर के आघात करना। ताल पूरना (अकर्मक)–ताल का आकार ठीक समय पर पूरा होना। ताल का क्रम ठीक बैठना। उदाहरण–इस मनु आगे पूरै ताल।–कबीर। ताल पूरना-(सकर्मक)=संगीत के समय उक्त प्रकार का आघात करते हुए ताल देना। ६. झाँझ, मंजीरा आदि बाजे जो उक्त विचार से समय का परिमाण ठीक रखने के लिए बजाये जाते हैं। ७. कुश्ती लड़ने के समय जाँघ या बाँह पर हथेली के आघात से उत्पन्न किया जानेवाला शब्द। मुहावरा–ताल ठोंकना=उक्त प्रकार का आघात करके या और किसी प्रकार यह सूचित करना कि आओ हम से लड़कर बल-परीक्षा कर लो। ८. ताड़ का पेड़। ९. ताला। १॰. ऐनक या चश्मे में लगा हुआ काँच, बिल्लौर आदि का टुकड़ा। पुं० [सं० तल्ल] [स्त्री० अल्पा० तलैया] छोटा जलासय। |
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ताल-कंद :
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पुं० [ब० स०] तालमूली। मुसली। |
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ताल-केतु :
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पुं० [ब० स०] १. केतु जिस पर ताल के पेड़ चिन्ह हो। २. वह जिसकी पताका पर ताड़ के पेड़ का चिन्ह हो। ३. भीष्म। ४. बलराम। |
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ताल-क्षीर :
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पुं० [मध्य० स०] खजूर या ताड़ के रस को पाग कर बनाई जानेवाली चीनी। |
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ताल-जंघ :
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पुं० [ब० स०] १. एक प्राचीन देश का नाम। २. उक्त देश का निवासी। ३. एक यदुवंशी राजा जिसके पुत्रों ने राजा सगर के पिता को राज्य से अलग किया था। |
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ताल-ध्वज :
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पुं० [ब० स०] १. दे० ‘तालकेतु’। २. एक प्राचीन पर्वत का नाम। |
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ताल-नवमी :
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स्त्री० [मध्य० स०] भाद्रपद शुक्ला नवमी। |
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ताल-पत्र :
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पु० [ष० त०] ताड़ के वृक्ष का पत्ता। ताड़ पत्र। विशेष–प्राचीन काल में ताल-पत्रों पर ही लेख लिखे जाते थे। |
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ताल-पर्ण :
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पुं० [ब० स०] कपूर कचरी। |
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ताल-पर्णी :
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स्त्री० [ब० स० ङीष्] १. सौंफ। २. कपूर कचरी। ३. तालमूली। मुसली। ४. सोआ नाम का साग। |
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ताल-पुष्पक :
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पुं० [ब० स० कप्] पंडुरिया। प्ररौंडरिकी। |
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ताल-बैताल :
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पुं० [सं० तालवेताल] ताल और बैताल नाम के दो पक्ष जिनके संबंध में यह प्रसिद्ध है कि राजा विक्रमादित्य ने इन्हें सिद्ध किया था और बराबर उनकी सेवा में रहते थे। |
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ताल-मूल :
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पुं० [ब० स०] लकड़ी की बनी हुई ढाल। |
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ताल-मूली :
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स्त्री० [ब० स० ङीष्] मुसली। |
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ताल-मेल :
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पुं० [हिं० ताल+मेल] १. ताल का सुरों के साथ होनेवाला मेल या संगति। २. किसी के सात होनेवाली उपयुक्त या ठीक योजना। संगति। उदाहरण–ताल मेल सौं मेलि रतन बहु रंग लगाए।–रत्ना। क्रि० प्र०–खाना।–बैठना ३. उपयुक्त अवसर। मौका। |
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ताल-रंग :
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पुं० [ब० स०] ताल देने का एक तरह का पुरानी चाल का बाजा। |
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ताल-रस :
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पुं० [ष० त०] ताड़ के वृक्ष का रस। ताड़ी। |
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ताल-लक्षण :
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पुं० [ब० स०] तालध्वजा बलराम। |
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ताल-वन :
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पुं० [ष० त०] १. ताड़ के पेड़ों का जंगल। २. ब्रज में गोवर्धन पर्वत के पास का एक वन जहाँ बलराम ने धेनुक को मारा था। |
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ताल-वृंत :
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पुं० [ब० स०] १. ताड़ के पत्ते का बना हुआ पंखा। २. सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का सोम। (प्राचीन वनस्पति)। |
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ताल-षष्टी :
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स्त्री० [मध्य० स०] भादों के कृष्ण पक्ष की छठ जिस जिन स्त्रियाँ पुत्र की कामना से व्रत करती है। ललही छठ। |
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ताल-स्कंध :
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पुं० [ब० स०] एक प्रकार का पुराना अस्त्र। |
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तालंक :
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पुं० [सं०-ताडंक(नि०लत्व)] ताटंक। |
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तालक :
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पुं० [सं० ताल+कन्] १. हरताल। २. ताला। ३. गोपी। चंदन। पुं०=तअल्लुक (संबंध)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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तालकट :
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पुं० [सं० ताल+कटच्।] बृहत्संहिता के अनुसार दक्षिण भारत का एक प्राचीन प्रदेश। |
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तालकाभ :
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वि० [तालक-आभा, ब० स०] हरा। पुं० हरा रंग। |
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तालकी :
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पुं० [सं० तालक+अण्+ङीप्] ताड़ वृक्ष का रस। ताड़ी। |
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तालकूटा :
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पुं० [हिं० ताल+कूटना] १. ताल देने के लिए झाँझ आदि बजानेवाला। २. वह भजनीक जो गाते समय झाँझ आदि बजाता हो। |
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तालकोशा :
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स्त्री० [सं०√क्रुश् (श्बद करना)+अच्-टाप्] एक तरह का पेड़। |
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तालचर :
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पुं० [सं० ताल√चर् (गति)+ट] १. एक प्राचीन देश का नाम। २. उक्त देश का निवासी। |
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तालपत्रिका :
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स्त्री० [सं० तालपत्री+कन्-टाप्, ह्रस्व] मूषकपर्णी। मूसाकानी बूटी। |
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तालबंद :
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पुं० [सं० तालिक–बंध] वह लेखा जिसमें आमदनी की समस्त मदें दिखलाई गई हों। |
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तालबेन :
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स्त्री० [सं० तालवेणु] एक तरह का बाजा। |
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तालमखाना :
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पुं० [हिं० ताल+मक्खन] १. गीली जमीन या दलदलों के आस-पास होनेवाला एक पौधा जिसकी पंत्तियों का साग बनता है। २. दे० ‘मखाना’। |
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तालमतूल :
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वि० [हिं० ताल+मतूल (अनु)०] किसी के जोड़ या बराबरी का। एक सा। |
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तालमूलिका :
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स्त्री० [सं० तालमूली+कन्-टाप्० ह्रस्व] दे० ‘तालमूली’। |
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तालवाही(हिन्) :
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वि० [सं० ताल√वह् (वहन करना)+णिनि] (बाजा) जिससे ताल दिया जाय। |
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तालव्य :
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वि० [सं० तालु+यत्] १. तालू संबंधी। २. (ध्वनि, वर्ण या शब्द) जिसका उच्चारण मुख्यतः तालू की सहायता से होता हो। पुं० वह वर्ण जिसका उच्चारण मुख्यतः तालू की सहायता से होता हो। जैसे–इ, ई, च, छ, ज, झ, ञ् और थ्। |
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तालसाँस :
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पुं० [सं० ताल+बं० साँस=गूदा] ताड़ के फल का गूदा जो प्रायः खाया जाता है। |
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ताला :
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पुं० [तालकः] एक प्रसिद्ध उपकरण जो ढकने, दरवाजे आदि बन्द करने के लिए होता और ताली की सहायता से खुलता और बंद होता है। क्रि० प्र०–खोलना–।–जड़ना।– बंद करना।–लगाना। मुहावरा–(किसी के घर में) ताला लगना–ऐसी अवस्था होना कि घर में कोई रहनेवाला न बच जाय। २. किसी प्रकार के आने-जाने का मार्ग या मुँह बंद करने का कोई उपकरम या साधन। जैसे–नहर का ताला। मुहावरा–ताला जड़ना-पूरी तरह से रोकना या बंद करना। ३.आवरण के रूप में रहनेवाला वह बाधक तत्त्व जिसे बिना हटाये अन्दर की बात या रहस्य का पता न चल सकता हो। ४. तवे के आकार का लोहे का वह उपकरण जिसे प्राचीन काल में योद्धा छाती पर बाँधते थे। |
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ताला-कुंजी :
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स्त्री० [सं० ताला+कुंजी] १. किवाड़, संदूक, आदि बंद करने का ताला और उसे खोलने-बंद करने की कुंजी या ताली।मुहा–(किसी के हाथ में) ताला-कुंजी होना=(क) आय-व्यय आदि का सारा अधिकार होना। (ख) संपत्ति पर पूर्ण अधिकार होना। २. लड़को का एक प्रकार का खेल। |
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ताला-ताली :
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स्त्री०=ताला-कुंजी। |
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तालांक :
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पुं० [ताल-अंक, ब० स०] १. वह जिसका चिन्ह ताड़ हो। २. भीष्म। ३. बलराम ४. आरा। ५. एक प्रकार का साग। ६. शिव। महादेव। ७. किताब। पुस्तक। ८. ऐसा पुरुष जिसमें सामुद्रिक के अनुसार अनेक शुभ लक्षण हों। |
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तालांकुर :
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पुं० [ताल-अंकुर, ष० त०] मैनसिल धातु। |
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तालाख्या :
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स्त्री० [सं० ताल-आख्या, ब० स०] कपूर कचरी। |
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तालाब :
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पुं० [हिं० ताल+फा० आब] वह छोटा जलाशय जिसके चारों ओर स्नानर्थियों की सुविधा के लिए सीढ़ियाँ आदि बनी होती है। |
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तालाबंदी :
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स्त्री० [हिं० ताला+फा० बंदी] १. तालाबंद करने या लगाने की क्रिया, अवस्था या भाव। २. औद्योगिक क्षेत्र में किसी कारखाने का अनिश्चित काल के लिए उसके स्वामी या स्वामियों के द्वारा बन्द किया जाना। (लाँक आउट)। |
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तालि :
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स्त्री० [?] समय। उदाहरण–तिणि तालि सखी गलि स्यामा तेही।–प्रिथीराज। |
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तालिक :
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पुं० [सं० तल्+ठक्-इक] १. फैली हुई या फैलाई हुई हथेली। २. वह डोरा जिससे ताड़-पत्र या उन पर लिखे हुए लेख नत्थी करके एक में बाँधे जाते थे। ३. ताड़पत्रों का पुलिंदा। |
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तालिका :
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स्त्री० [सं० ताली+कन्-टाप्, ह्रस्व] १. ताली। कुंजी। २. लिखित ताल-पत्रों, कागजों आदि का पृथक् और स्वतन्त्र पुंलिदा। नत्थी। ३. ऐसी सूची जिसमें बहुत सी वस्तुओं आदि के नामों का उल्लेख हो। फेहरिम्त। सूची। ४. [तलिक+टाप्] चपत। थप्पड़। ५. ताल-मूली । मुसली। ६. मजीठ। |
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तालिब :
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वि० [अ०] १. तलब करनेवाला। २. खोजने या ढूँढ़नेवाला। ३. चाहनेवाला। |
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तालिब-इल्म :
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पुं० [अ०] [भाव० तालिब-इल्मी] १. वह जिसे इल्म अर्थात् विद्या की चाह हो। २. विद्यार्थी। |
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तालिम :
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स्त्री० [सं० तल्प] १. शय्या। २. बिस्तर। (डिं०)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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तालियामार :
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पुं० [हिं० ताली+मारना] जहाज का आगे या सामने का वह निचला अंश जो पानी को काटता है। गलही। (लश०)। |
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तालिश :
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पुं० [सं०√तल् (प्रतिष्ठा)+इश, णित्-वृद्धि] पर्वत। पहाड़। |
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ताली :
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स्त्री० [सं०√तल्+णिच्+अच्-ङीष्] १. एक प्रकार का पहाड़ी ताड़। बजर-बटट्। २. ताल-मूली। मुसली। ३. भू-आँवला। ४. ताम्रवल्ली लता। ५. अरहर। ६. एक प्रकार का वर्णवृत्त। ७. मेहराब के बीचोबीच का पत्थर या ईंट जो दोनों ओर के पत्थरों या ईटों को गिरने से रोके रहती है। ८. [ताल+अण्] ताड़ का रस। ताड़ी। स्त्री० [हिं० ताला] १. ताले के साथ रहनेवाला वह छोटा उपकरम जिसकी सहायता से ताला खोला और बंद किया जाता है। कुंजी। चाबी। क्रि० प्र०–खोलना।–लगाना। २. किसी प्रकार का आवागमन या मार्ग खोलने और बंद करने का कोई उपकरण या साधन। जैसे–बिजली के तार में उसका प्रवाह रोकने की ताली। विशेष दे० कुंजी। स्त्री० [सं० ताल] १. थप थप शब्द उत्पन्न करने के लिए दोनों हाथों की हथेलियों को एक दूसरी पर मारने की क्रिया। २. उक्त क्रिया से उत्पन्न होनेवाला शब्द जो किसी की प्रशंसा और अपनी प्रसन्नता का सूचक होता है। करतल-ध्वनि। थपोड़ी। विशेष–कभी-कभी दूसरों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए ऐसा शब्द उत्पन्न किया जाता है मुहावरा–ताली पिटना=किसी की दुर्दशा होने पर लोगों में उसका उपहास होना। ताली पीटना=कोई अच्छा काम या बात देकर और उससे प्रसन्न होकर उसकी प्रशंसा और अपना समाधान सूचित करने के लिए हथेलियों से कई बार उक्त प्रकार का शब्द करना। कहा–एक हाथ से ताली नहीं बजती-कोई क्रिया या व्यवहार एक पक्ष से तब तक नहीं पूरा होता जब तक दूसरे पक्ष से भी वैसी ही क्रिया या व्यवहार न हो। पुं० शिव। स्त्री० [हिं० ताल-जलाशय] छोटा ताल। तलैया। गबड़ी। स्त्री० [?] पैर में बिचली उंगली का अगला भाग। |
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समानार्थी शब्द-
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ताली-पत्र :
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पुं० [ब०स०] तालीश-पत्र। |
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तालीका :
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पुं० [अ० तअलीकः] १. माल-असबाब की कुर्की या जब्ती। २. कुर्क या जब्त किए हुए माल-असबाब की सूची। तालिका। |
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तालीम :
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स्त्री० [अ०] १. निपुण तथा योग्य बनाने के लिए किसी को सखाई जानेवाली बातें या दिये जानेवाले उपदेश। २. पढ़ना-लिखना सीखने या सिखाने का कार्य या कार्य-प्रणाली। शिक्षा। |
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तालीश-पत्र :
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पुं० [ब० स०] १. तमाल या तेजपत्ते की जाति का एक पेड़ जिसके कई अंगों का उपयोग ओषधि के काम में होता है। २. भू-आँवले की जाति का एक प्रकार का छोटा पौधा। |
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तालीश-पत्री :
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स्त्री० [सं० ब० स०] तालीश-पत्र। |
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तालु :
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पुं० [सं०√तृ(तैरना)+ञुण्, लत्व] [वि० तालव्य] तालू। |
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तालु-कंटक :
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पुं० [ब० स०] एक रोग जिसमें तालू में काँटे निकल आते हैं। |
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तालु-जिह्व :
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पुं० [ब० स०] घड़ियाल। |
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समानार्थी शब्द-
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तालु-पाक :
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पुं० [ब० स०] तालू में होने वाला रोग। |
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तालु-पुप्पुट :
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पुं० [ब० स०] तालूपाक रोग। |
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समानार्थी शब्द-
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तालुक :
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पुं० [सं० तालु+कन्] १. तालू। २. तालू में होनेवाला एक तरह का रोग। पुं०=ताल्लुक (संबंध)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
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तालुका :
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स्त्री० [सं० तालुक+टाप्] तालू के अन्दर की एक नाड़ी। पुं०=ताअल्लुका।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
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तालुशोष :
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पुं० [ब० स०] तालू में होनेवाला एक तरह का रोग। |
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समानार्थी शब्द-
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तालू :
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पुं० [सं० तालू०] १. मुँह के अन्दर का वह ऊपरी भाग जो ऊपरवाले दाँतों की पंक्ति और गले के कौए या घंटी तक विस्तृत रहता है तथा जिसके नीचे जीभ रहती है। (पैलेट)। मुहावरा–तालू उठाना-तुरन्त के जन्मे हुए बच्चे के तालू को दबाकर कुछ ऊपर और ठीक स्थान पर करना जिसमें मुँह अच्छी तरह खुल सके और उसके अन्दर कुछ अवकाश या जगह निकल आवे। (किसी के) तालू में दाँत जमना-किसी का ऐसे बहुत बुरे या विकट काम की ओर प्रवृत्त होना जिससे अंत में स्वयं उसी को बहुत बड़ी हानि हो। (किसी के) तालू में दाँत निकलना=दे० ‘दाँत’ के मुहा० के अंतर्गत। तालू से जीभ न लगना=बराबर कुछ न कुछ बकते-बोलते रहना। कभी चुप न रहना। २. खोपड़ी के अन्दर और मुंह के उक्त अंग के ऊपर का सारा भाग। दिमाग। मस्तिष्क। मुहावरा–तालू चटकना=प्यास, रोग आदि के कारण सिर में बहुत अधिक गरमी जान पड़ना। ३. घोड़ों का एक अशुभ लक्षण जो ऐब या दोष माना जाता है। |
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समानार्थी शब्द-
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तालूफाड़ :
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पुं० [हिं० तालू+फाड़ना] हाथियों के तालू में होनेवाला एक तरह का रोग जिसमें घाव हो जाते हैं। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तालूर :
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पुं० [सं०√तल् (प्रतिष्ठा करना)+णिच्+ऊर्] पानी का भँवर। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तालूषक :
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पुं० [सं०√तल्+णिच्+ऊषक्]=तालु। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तालेवर :
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वि० [अ० ताला-भाग्य+फा० वर (प्रत्यय)] १. धनाढ्य। धनी। २. भाग्यवान। सौभाग्यशाली। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
ताल्लुक :
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पुं० [अ० तअल्लुकः] १. संबंध। २. लगाव। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
ताल्लुका :
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पुं० [अ० तअल्लुकः] आस-पास के कई गाँवों का समूह जो किसी एक ही जमींदार के अधिकार में होता था। इलाका। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
ताल्लुकेदार :
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पुं० [अ० तअल्लुकः+फा० दार] १. किसी ताल्लुके का जमींदार २. अँगरेजी शासन में अवध प्रदेश में वह जमींदार जिसे सरकार से कुछ विशिष्ट अधिकार प्राप्त होते थे। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
ताल्वर्बुद :
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पुं० [सं० तालु-अर्बुद, ष० त०] तालू में उत्पन्न होनेवाला एक तरह का काँटा जिससे बहुत कष्ट होता है। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |