हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन - मोहनदेव-धर्मपाल Hindi Sahitya Ka Digdarshan - Hindi book by - Mohandev-Dharmapal
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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन

मोहनदेव-धर्मपाल


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :187
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9809
आईएसबीएन :9781613015797

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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन-वि0सं0 700 से 2000 तक (सन् 643 से 1943 तक)

मैथिलीशरण गुप्त

जन्म - गुप्त जी का जन्म श्रावण शुक्ला द्वितीया सोमवार सं० १९४३ को चिरगाँव जिला झाँसी में हुआ। इनके पिता सेठ रामचरण जी भी काव्य-प्रेमी भावुक भक्त थे। वे स्वयं भी कविता किया करते थे। सेठजी के पाँच पुत्रों में से दो श्री मैथिलीशरण और सियारामशरण सरस्वती की अनन्य आराधना के द्वारा लक्ष्मी देवी के भी कृपापात्र बन गये और शेष तीन भाई व्यापार-व्यवसाय ही में लगे रहे।

गुप्त जी की शिक्षा-दीक्षा चिरगाँव में ही हुई। यद्यपि मेकडानल हाई स्कूल झाँसी में भी उन्हें पढ़ने के लिए भेजा गया था, पर वहाँ मन न लगने के कारण वापिस घर बुला लिया गया, और घर पर ही पढ़ाई का प्रबन्ध कर दिया गया। हिन्दी, अंग्रेजी, गणित आदि के साथ संस्कृत की शिक्षा भी बचपन से ही दी गई थी। अमरकोष को दोनों भाइयों ने बचपन में ही कंठस्थ कर डाला था। हिन्दी के प्रसिद्ध मुसलमान कवि श्री मुन्शी अजमेरी की देख-रेख में दोनों भाइयों का अध्ययन सुचारु रूप से चलने लगा। मुन्शी अजमेरी जी को सेठ रामचरण जी अपना छठा पुत्र मानते थे। मुन्शी जी की कंठस्थ कराई कविताओं ने गुप्त जी की काव्य-प्रतिभा को अंकुरित व पल्लवित किया, तथा द्विवेदी जी के गुरुत्व ने उसे पुष्पित तथा फलित बनाया। उनकी यह काव्य-प्रतिभा बचपन में ही प्रकट होने लगी थी। बचपन में इनके बनाये हुए एक छन्द को देखकर इनके पिताजी ने मैथिलीशरण को आशीर्वाद दिया था कि तू आगे चलकर हमसे हजार गुना अच्छी कविता करेगा। इस प्रकार कवित्व और रामभक्ति दोनों उन्हें पिताजी से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुए। द्विवेदी जी की प्रेरणा व प्रोत्साहन से उनकी काव्य-प्रतिभा चमत्कृत हो उठी। आरम्भ में वे कलकत्ते के जातीय पत्र में अपनी रचनाएँ प्रकाशनार्थ भेजते रहे। कुछ ही समय पश्चात् वे 'सरस्वती' में भी अपनी रचनाएँ भेजने लगे। द्विवेदी जी इनकी रचनाओं को काट-छाँट कर, सजा-सँवार कर प्रकाशित करते। एक बार गुप्त जी ने एक कविता द्विवेदी जी को भेजी। 'सरस्वती' में उसे शीघ्र प्रकाशित न देखकर गुप्त जी के धैर्य का बाँध टूट गया। इन्होंने उसे तत्काल जातीय साप्ताहिक पत्र में भेजकर प्रकाशित करवा दिया। इधर कुछ दिनों पश्चात् 'सरस्वती' में भी वह कविता एक नवीन आकर्षक, निखरे हुए रूप में प्रकाशित होकर उनके पास आ पहुंची। साथ ही द्विवेदी जी का एक पत्र भी था जिसमें लिखा हुआ था-',कविता के मूल रूप और इस रूप में कितना अन्तर है-ध्यान से देखो। किसी कविता को हमारे पास प्रकाशनार्थ भेजने पर यदि हम उसे छाप दें तो ठीक, यदि नहीं छापें तो समझो कि वह छपने योग्य नहीं है। उसे अन्यत्र प्रकाशनार्थ मत भेजी।'' इस हार्दिक सहानुभूति को पाकर गुप्त जी का अन्तरतम सचमुच पुलकित हो उठा। फिर तो उन्होंने एक के बाद दूसरे ऐसे रचना-रत्न भगवती भारती के चरणकमलों में अर्पित किये जिनसे उसका भंडार जगमगा उठा। तब से लेकर आज तक गुप्त जी सतत जागरूक भाव से साहित्य-साधना करते चले आ रहे हैं।

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