हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन - मोहनदेव-धर्मपाल Hindi Sahitya Ka Digdarshan - Hindi book by - Mohandev-Dharmapal
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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन

मोहनदेव-धर्मपाल


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :187
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9809
आईएसबीएन :9781613015797

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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन-वि0सं0 700 से 2000 तक (सन् 643 से 1943 तक)

महाकवि भूषण

जन्म-स्थान और समय- महाकवि भूषण का जन्म कानपुर जिले की घाटमपुर नाम तहसील के तिकवाँपुर (त्रिविक्रमपुर) ग्राम में हुआ था। यह गाँव यमुना के किनारे पर बसा हुआ है। ये त्रिपाठी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम रत्नाकर त्रिपाठी था। कहा जाता है कि रत्नाकर जी देवी के बहुत बड़े भक्त थे। भगवती के आशीर्वाद से ही उनके चिन्तामणि, भूषण, मतिराम व नीलकण्ठ उपनाम जटाशंकर नामक चार पुत्र हुए। ये चारों भाई हिन्दी के बड़े अच्छे कवि थे। भूषण का जन्म संवत् १६९२ के लगभग माना जाता है।

भूषण बचपन से ही बड़े स्वतन्त्र और मस्त प्रकृति के प्राणी थे। घर पर ही रहते, खाते-पीते और मौज करते। काम-धाम की कभी कुछ चिन्ता न थी। तीनों भाई बाहर राजा-महाराजाओं और सम्राटों के आश्रय में रहकर खूब धन घर भेजते अत: भूषण को काम की कोई आवश्यकता न थी। पर भाभियों से यह कैसे देखा जाता कि उनके पति कमाई के लिए विदेशों में भटकते फिरें और यह निठल्ला देवर घर बैठे-बैठे मुफ्त की रोटियाँ तोड़ा करे। अन्त में एक दिन भूषण को भोजन में नमक कम लगा तो उसने कहा-''भाभी, नमक कम है, थोड़ा नमक दे दो।''

''बड़ा नमक कमाकर धर रखा है तुमने, जो और मांगते हो,'' यह कड़कता हुआ उत्तर मिला।

बस फिर क्या था! हाथ का ग्रास हाथ ही में रहा, वह मुँह में न जा सका। वे एकदम उठ खड़े हुए और घर से निकल पड़े। बस, इस एक छोटी-सी घटना ने ही एक अज्ञातनामा साधारण-से निकम्मे व्यक्ति को हिन्दी-कवियों का शिरोभूषण बना दिया और यहां तक कि वह 'भूषण' नाम से विख्यात हो गया। आज कोई नहीं जानता कि उसका अपना वास्तविक नाम क्या था।

बात यों हुई कि भूषण कवि उसी समय घर से निकल पड़े। काव्य-प्रतिभा तो जन्म-जात थी ही। देखते-ही-देखते इतनी अच्छी कविता लिखने लगे कि चित्रकूट-नरेश के सुपुत्र रुद्रराम सोलंकी ने आपको अपने आश्रय में रख लिया और 'कवि-भूषण' की उपाधि दी। बस आप इसी उपाधि से प्रसिद्ध हो गये।

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