हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन - मोहनदेव-धर्मपाल Hindi Sahitya Ka Digdarshan - Hindi book by - Mohandev-Dharmapal
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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन

मोहनदेव-धर्मपाल


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :187
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9809
आईएसबीएन :9781613015797

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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन-वि0सं0 700 से 2000 तक (सन् 643 से 1943 तक)

महाकवि बिहारी

जन्म स्थान व समय- महाकवि बिहारी का जन्म ग्वालियर राज्य के बसुवा गोविन्दपुर नामक गाँव में सम्वत् १६५२ में हुआ था। आप माथुर चतुर्वेदी ( चौबे) ब्राह्मण थे। कहा जाता है कि सम्वत् १६६० के लगभग आपके पिता केशवराय ग्वालियर से ओरछा चले गये, जहाँ उनकी हिन्दी के प्रसिद्ध कवि केशवदास से भेंट हुई। केशवराय ने अपने पुत्र बिहारी को काव्य-कला की शिक्षा के लिए केशव का शिष्य बना दिया। इस प्रकार केशवदास बिहारी के कविता-गुरु बने।

केशवराय थोड़े ही दिन तक ओरछा में रहकर ब्रज चले आये। यहाँ रह कर बिहारी ने साहित्य का अच्छा अध्ययन किया। इस समय तक केशवराय की पत्नी का देहान्त हो चुका था, अत: वे अपने दो पुत्रों (बलभद्र मिश्र और बिहारी) तथा एक कन्या को लेकर बाबा नागरीदास के साथ यमुना कछार में कुटिया बनाकर रहने लगे। केशवराय नागरीदास जी के अनन्य भक्त थे। उनके कहने से ही उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह हरिकृष्ण मिश्र के साथ कर दिया जिनके पुत्र श्री कुलपति मिश्र हिन्दी के विख्यात विद्वान् और कवि हुए।

विवाह एवं राजाश्रय- बिहारी का विवाह व्रज के एक माथुर-ब्राह्मण परिवार में हो गया। अपनी तीनों संतानों के विवाह कर देने पर केशवराय जी विरक्त हो गये। तत्पश्चात् बिहारी भी अपनी ससुराल मधुरा में आ बसे। बिहारी के गुरु बाबा नरहरिदास एक बार नागरीदास जी के पास आये। सम्राट् जहाँगीर भी इन दोनों महात्माओं-नागरीदास और नरहरिदास के दर्शनों के लिए व्रज आया। उस समय नरहरिदास जी ने बिहारी का परिचय जहाँगीर से करवा दिया। इस प्रकार बिहारी को राज्याश्रय प्राप्त हो गया। जहाँगीर के पुत्र शाहजहाँ ने बिहारी का बहुत सम्मान किया और उन्हें आगरे में अपने पास ही दरबार में रखा। अब्दुर्रहीम खानखाना से भी इनका अच्छा परिचय और प्रेम था। शाहजहाँ की कृपा से बिहारी अनेक राजाओं के कृपापात्र बन गये। नूरजहाँ के षड्‌यन्त्रों के कारण शाहजहाँ को जब आगरा छोड्‌कर दक्षिण की ओर जाना पड़ा तो बिहारी भी वापिस आगरा से मधुरा आ गये। एक बार वे अपनी वार्षिक वृत्ति लेने के लिए जोधपुर गये, जहाँ के विद्वान् और साहित्य-प्रेमी जसवंतसिंह ने आपका बड़ा आदर-सत्कार किया। कुछ लोगों का विचार है कि 'भाषाभूषण' वास्तव में बिहारी की ही रचना है जो जसवंतसिंह की स्मृति में लिखा गया।

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