हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन - मोहनदेव-धर्मपाल Hindi Sahitya Ka Digdarshan - Hindi book by - Mohandev-Dharmapal
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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन

मोहनदेव-धर्मपाल


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :187
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9809
आईएसबीएन :9781613015797

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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन-वि0सं0 700 से 2000 तक (सन् 643 से 1943 तक)

हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध रचनाकार

महात्मा कबीर

ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि, संतशिरोमणि, महात्मा कबीर के जीवन-वृत्त के सम्बन्ध में अभी तक सर्वसम्मत प्रामाणिक तथ्यों पर नहीं पहुंचा जा सका। उनका जन्म कहाँ और कब हुआ, उनका सत्यलोकवास कब हुआ, उन्होंने अपने जन्म से किस महिमामयी माँ की कलित कोख और गरिमाशालिनी गोद को गौरवान्वित किया, ऐसे महामहिमशाली महात्मा के पिता होने का महान् सम्मान किसे उपलब्ध हुआ और उन्होंने अपने अगर्वभाव से किस जाति, कुल और सम्प्रदाय को अलंकृत किया- इन सब प्रश्नों के आगे प्रश्नसूचक चिह्न अभी तक पूर्णतया मिट नहीं पाये है।

जन्म-समय- महात्मा कबीर के जन्म-संवत् के सम्बन्ध में दो मत सर्वाधिक प्रचलित हैं। एक मत के समर्थक सं० १४५५ में तो दूसरे १४५६ में इनका जन्म मानते हैं। अपने समर्थन में दोनों ही इस प्रसिद्ध दोहे को उद्‌धृत करते हैं-

चौदह सौ पचपन साल गये, चन्द्रवार शुभ ठाठ ठये।
जेठ सुदी बरसायत को, पूरनमासी प्रगट भये।।

यद्यपि 'चौदह सौ पचपन' का सीधा-सा अर्थ संवत् १४५५ ही है फिर भी डा० श्यामसुन्दरदास आदि आलोचक इसका अर्थ चौदह सौ पचपन साल' के बीत जाने पर चौदह सौ छप्पन मानते हैं।

पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल आदि कुछ विद्वान इनका जन्म-संवत् चौदह सौ सत्ताईस मानते हैं।

'कबीर और कबीर-पंथ' के लेखक पादरी बेस्कर साहब इनका जन्म संवत् १४९७ मानते हैं।

उक्त चारों पक्षों में से चौदह सौ पचपन पक्ष को मानने वाले विद्वान ही अधिक हैं। बहुमत से कबीर का जन्म-संवत् १४५५ ही ठहरता है। यद्यपि इस दोहे में आये तिथि-वारों की गणना प्रामाणिक रूप से नहीं की गई, तथापि जिन लोगों ने व्यक्तिगत रूप से की है उनका कथन है कि चौदह सौ पचपन या छप्पन किसी भी वर्ष में जेठ सुदी पूर्णिमा को सोमवार नहीं पड़ता, पर इस सम्बन्ध में हमारा निवेदन यह है कि प्राचीन तिथिपत्रों में एक-आध दिन का अन्तर पड़ जाना' स्वाभाविक है। आज गणना करने पर एक तिथि को रविवार या मंगलवार पाते हैं तो उसी तिथि को दूसरे गणित से गणना करने पर सोमवार भी हो सकता है। अत: हमें बाल की खाल न उतारते हुए संवत् चौदह सौ पचपन की जेठ सुदी पूर्णिमा ही कबीर की जन्मतिथि मान लेनी चाहिए।

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