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प्रेमचन्द की कहानियाँ 19

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :266
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9780
आईएसबीएन :9781613015179

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का उन्नीसवाँ भाग


लेकिन मुंशी जी ने उनका हाथ पकड़ गली के सामने से हटा दिया और गली में दाखिल हो गये। उनके तीनों साथी स्वामी जी के पीछे सिर झुकाये खड़े रहे।
 
मुंशी– रामबली, झिनकू आते क्यों नहीं? किसकी ताकत है कि हमें रोक सके।

झिनकू– तुम ही काहे नहीं लौट आवत हो। साधु-संतन की बात माने को होत है।

मुंशी– तो इसी हौसले पर घर से निकले थे?

रामबली– निकले थे कि कोई जबर्दस्ती रोकेगा तो उससे समझेंगे साधु-संतों से लड़ाई करने थोड़े ही चले थे।

मुंशी– सच कहा है, गँवार भेड़ होते हैं।
 
बेचन– आप शेर हो जाएँ, हम भेड़ ही बने रहेंगे।

मुंशी जी अकड़ते हुए शराबखाने में दाखिल हुए। दुकान पर उदासी छायी हुई थी, कलवार अपनी गद्दी पर बैठा ऊँघ रहा था। मुंशी जी की आहट पा कर चौंक पड़ा, उन्हें तीव्र दृष्टि से देखा मानों यह कोई विचित्र जीव है, बोतल भर दी और ऊँघने लगा।

मुंशी जी गली के द्वार पर आये तो अपने साथियों को न पाया। बहुत से आदमियों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और निंदासूचक बोलियाँ बोलने लगे।
 
एक ने कहा– दिलावर हो तो ऐसा हो।

दूसरा बोला– शर्मचे कुत्तीस्त कि पेशे मरदाँ विवाअद (मरदों के सामने लज्जा नहीं आ सकती।)

तीसरा बोला– है कोई पुराना पियक्कड़ पक्का लतियल।

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