प्रेमचन्द की कहानियाँ 6 - प्रेमचंद Premchand Ki Kahaniyan 6 - Hindi book by - Premchand
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प्रेमचन्द की कहानियाँ 6

प्रेमचंद


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9767
आईएसबीएन :9781613015049

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का छटा भाग


पहले- लड़की वालों का क्या दोष है सिवा इसके कि वह लड़की का बाप है।

दूसरे- सारा दोष ईश्वर का जिसने लड़कियां पैदा कीं। क्यों ?

पांचवें- मैं यह नहीं कहता। न सारा दोष लड़की वालों का है, न सारा दोष लड़के वालों का। दोनों की दोष है। अगर लड़की वाला कुछ न दे तो उसे यह शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है कि डाल क्यों नहीं लायें, सुंदर जोड़े क्यों नहीं लाये, बाजे-गाजे पर धूमधाम के साथ क्यों नहीं आये ? बताइए !

चौथे- हां, आपका यह प्रश्न गौर करने लायक है। मेरी समझ में तो ऐसी दशा में लडके के पिता से यह शिकायत न होनी चाहिए।

पांचवें- तो यों कहिए कि दहेज की प्रथा के साथ ही डाल, गहनें और जोडों की प्रथा भी त्याज्य है। केवल दहेज को मिटाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है।

यशोदानन्द- यह भी थोथी दलील है। मैंने दहेज नहीं लिया है। लेकिन क्या डाल-गहने न ले जाऊंगा।

पहले- महाशय आपकी बात निराली है। आप अपनी गिनती हम दुनियां वालों के साथ क्यों करते हैं ? आपका स्थान तो देवताओं के साथ है।

दूसरा- 20 हजार की रकम छोड़ दी ? क्या बात है।

यशोदानन्द-- मेरा तो यह निश्चय है कि हमें सदैव सिद्वांतों पर स्थिर रहना चाहिए। सिद्धांत के सामने धन की कोई मूल्य नहीं है। दहेज की कुप्रथा पर मैंने खुद कोई व्याख्यान नहीं दिया, शायद कोई नोट तक नहीं लिखा। हां, सभा में इस प्रस्ताव को अनुमोदन कर चुका हूं। मैं उसे तोड़ना भी चाहूं तो आत्मा न तोड़ने देगी। मैं सत्य कहता हूं, यह रुपये लूं तो मुझे इतनी मानसिक वेदना होगी कि शायद मैं इस आघात से बच ही न सकूं।

पांचवें- अब की सभा आपको सभापति न बनाये तो उसका घोर अन्याय है।

यशोदानन्द- मैंने अपना कर्तव्य कर दिया उसकी कदर हो या न हो, मुझे इसकी परवाह नहीं।

इतने में खबर हुई कि महाशय स्वामीदयाल आ पहुंचे। लोग उनका अभिवादन करने को तैयार हुए, उन्हें मसनद पर ला बिठाया और तिलक का संस्कार आरम्भ हो गया। स्वामीदयाल ने एक ढाक के पत्तल पर नारियल, सुपारी, चावल पान आदि वस्तुएं वर के सामने रखीं। ब्राह्मणों ने मंत्र पढ़े, हवन हुआ और वर के माथे पर तिलक लगा दिया गया। तुरन्त घर की स्त्रियों ने मंगलाचरण गाना शुरू किया। यहां महफिल में महाशय यशोदानन्द ने एक चौकी पर खड़े होकर दहेज की कुप्रथा पर व्याख्यान देना शुरू किया। व्याख्यान पहले से लिखकर तैयार कर लिया गया था। उन्होंने दहेज की ऐतिहासिक व्याख्या की थी--

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