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प्रेमचन्द की कहानियाँ 2

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :153
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9763
आईएसबीएन :9781613015001

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का दूसरा भाग


अब की बार मैंने जूँ-तूँ करके हँसी रोकी और उनकी बात काटकर बोला,  ''मेरे श्रीमान, ठहरिए, ठहरिए! मैं जिस काम के लिए आपकी खिदमत में हाजिर हुआ हूँ वह और ही काम है।''

यह सुनकर उनका गुस्सा और भी बढ़ा। झुँझलाकर बोले, ''तो फिर अब तक क्यों नहीं कहा? वह काम कौन-सा है?''

''बतलाता हूँ सुनिए। मैं चाहता हूँ कि आपका नाटक बड़ी धूमधाम से खेला जाए।''

यह सुनकर हेम बाबू ठंडे पड़े। मुस्कराकर बोले, ''देखिए देवेंद्र बाबू कल रात को खटमलों के मारे आँख तक नहीं लगी। तबीयत बदमज़ा है। झुँझलाहट में अगर आपको कुछ कह-सुन दिया तो माफ़ कीजिएगा। हाँ, तो इस बारे में आप क्या प्रस्ताव करते हैं?''

मैंने जवाब दिया, ''मेरी तरकीब बिलकुल अछूती है। आइए, आप और मैं कश्मीर चलकर...।''

हेम बाबू ने बात काटकर कहा, ''कश्मीर चलकर? आप क्या कहते हैं? कश्मीर हिंदुस्तान की उत्तरी सीमा पर है। क्या हम लोग इतनी दूर जाएँगे? यह ठीक नहीं। यह ग़ैर मुमकिन-सा मालूम होता है। कोई दूसरी तरक़ीब हो तो बतलाइए।''

हेम बाबू जितने ही मोटे हैं, उतने ही आलसी हैं। एक जगह से दूसरी जगह जाना उनके लिए यमराज के यहाँ जाने से कम नहीं। आलस्य ही तक नहीं, एक मुश्किल और भी थी। वह हाल ही में दूसरी शादी करके लाए थे। बुढ़ापे में उस सोलह साला सुंदरी के पीछे दीवाने हो रहे थे। उससे एक लम्हे की जुदाई दुखद थी। हमेशा उसके आँचल के कोने में बँधे रहना चाहते थे। दुगुनी मिठास का लुत्फ़ कौन नहीं जानता था। इसलिए मुझे उनके कश्मीर न जाने पर जरा भी ताज्जुब नहीं हुआ। मैं तो यह पहले ही सोच चुका था और उसके लिए तैयार था।

मैंने हँसते हुए उन्हें समझाकर कहा, ''अजी, आपने पूरी बात तो सुनी ही नहीं। मैं सचमुच कश्मीर चलने को थोड़े ही कहता हूँ। हम और आप किसी गाँव में चलकर तीन माह तक छुपे रहें। उधर मेरे प्रचार करने वाले अखबारों में खबर उड़ा देंगे कि यूनियन थिएटर के मालिक और 'अज़मत-ए-कश्मीर' के लेखक, दोनों कश्मीर से ऐतिहासिक चित्र जमा करने के लिए साथ-साथ कश्मीर गए है। वहाँ के रस्मो-रिवाज़ और समाज के दृश्य एकत्र कर रहे हैं। इस धूमधाम से 'अज़मत-ए-कश्मीर' अबकी खेला जाएगा। आज तक कोई नाटक इतनी तैयारियों से नहीं खेला गया और न अब शायद खेला जाए। नाटक क्या होगा, कश्मीर की सुहानी सैर होगी, वगैरा, वगैरा। इसके बाद वह कहेंगे कि आज दोनों पर्यटक फलाँ पहाड़ की चोटी पर पहुँचे और उसका फोटो लिया। आज फलाँ बात की खोज की। आज फलाँ झील की सैर की। आज फलाँ नाच-गाने की सभा में शरीक हुए और उसकी तस्वीर कश्मीर की सुंदरियों के साथ के उतारी। हर दिन अखबारों में इसी किस्म की खबरें प्रकाशित की जाएँगी। तीन महीने में अच्छी हलचल हो जाएगी और जब खेल होगा तो उस दिन सारा शहर उमड़ आएगा। बैठनेवालों को जगह न मिलेगी। नाकाम लौट जाएँगे।''

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