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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


जाने के वक्त पद्मा रोने लगी। उसे अपना पता देते हुए कहा, “दीदी ने तुमसे मुझे चिट्ठी लिखते रहने के लिए कहा है- तुम्हारी जो इच्छा हो वह मुझे लिखकर भेजना पद्मा।”

“पर मैं तो अच्छी तरह लिखना नहीं जानती, गुसाईं।”

“तुम जो लिखोगी मैं वही पढ़ लूँगा।”

“दीदी से मिलकर नहीं जाओगे?”

“फिर मुलाकात होगी पद्मा, अब तो मैं जाता हूँ।” कहकर बाहर निकल पड़ा।

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आँखें जिसे सारे रास्ते अन्धकार में भी खोज रही थीं, उससे मुलाकात हुई रेलवे स्टेशन पर। वह लोगों की भीड़ से दूर खड़ी थी, मुझे देख नजदीक आकर बोली, “एक टिकिट खरीद देना होगा गुसाईं।”

“तब क्या सचमुच ही सबको छोड़कर चल दीं?”

“इसके अलावा और तो कोई उपाय नहीं है।”

“कष्ट नहीं होता कमललता?”

“यह बात क्यों पूछते हो गुसाईं, सब तो जानते हो।”

“कहाँ जाओगी?”

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