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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“नहीं, वह मेरे बिस्तर उठाने वाला आदमी नहीं है!”
“तो फिर साथ में किसन जाय?”
“भले जाय, पर जरूरत नहीं है।”
“जाकर रोज चिट्ठी दोगे, बोलो?”
“समय मिला तो दूँगा।”
“नहीं, यह नहीं सुनूँगी। एक दिन चिट्ठी न मिलने पर मैं खुद आ जाऊँगी चाहे तुम कितने ही नाराज क्यों न हो।” '
अगत्या राजी होना पड़ा, और हर रोज संवाद देने की प्रतिज्ञा करके उसी दिन चल पड़ा। देखा कि दुश्चिन्ता से राजलक्ष्मी का मुँह पीला पड़ गया है, उसने आँखें पोंछकर अन्तिम बार सावधान करते हुए कहा, “वादा करो कि शरीर की अवहेलना नहीं करोगे?”
“नहीं, नहीं, करूँगा।”
“कहो कि लौटने में एक दिन की भी देरी नहीं करोगे?”
“नहीं, सो भी नहीं करूँगा!”
अन्त में बैलगाड़ी रेलवे स्टेशन की तरफ चल दी।
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