लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


वह गा रही थी-

एके पद-पंकज पंके विभूषित, कंटक जर जर मेल,

तुया दरसन आशे कछु नाहिं, जानलु, चिरदुख अब दूर गेल।

तोहारि मुरली जब श्रवणे प्रवेराल, छोड़नु गृहसुखआस,

पंथक दुख तृणहुं करि न गणनु कहतँ ह गोविन्ददास॥

बड़े गुसाईंजी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी, वे आवेग और आनन्द की प्रेरणा से उठ खड़े हुए। मूर्ति से कण्ठ से मल्लिका की माला उतारकर उन्होंने राजलक्ष्मी के गले में पहना दी और कहा, “प्रार्थना करता हूँ, तुम्हारे सब अकल्याण दूर हो जाँय।”

राजलक्ष्मी ने झुककर नमस्कार किया, फिर उठकर मेरे पास आयीं, सबके सामने पैरों की धूल माथे पर लगाई और आहिस्ते से कहा, “यह माला रक्खी है, बख्शीश का डर न दिखाया होता तो यहीं तुम्हारे गले में पहना देती।” कहकर तुरन्त ही वह चली गयी।

गाने की बैठक खत्म हुई। ऐसा लगा मानो आज जीवन सार्थक हो गया।

क्रमश: प्रसाद-वितरण का आयोजन शुरू हुआ। अन्धकार में उसे जरा ओट में बुलाकर कहा, “वह माला रख दो। यहाँ नहीं, घर लौटकर तुम्हारे हाथों से ही पहिनूँगा।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book