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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


राजलक्ष्मी ने सभय कहा, “रक्षा करो, गुसाईं, कहीं सबके सामने बख्शीश देने मत आ जाना। तुम्हारे लिए असम्भव कुछ भी नहीं है।”

सुनकर वैष्णवियाँ हँसने लगीं, पद्मा खुश होने पर ताली बजाने लगती है। बोली, “मैं स-म-झ-ग-ई।”

कमललता ने उसकी तरफ सस्नेह देखकर हँसते हुए कहा, “दूर हट कलमुँही-चुप रह।” राजलक्ष्मी से बोली, “इसे ले जाओ बहन, क्या मालूम अचानक क्या कह बैठे।”

देवता की संध्या-आरती के बाद कीर्तन की बैठक जमी। आज बहुत-से दीपक जल रहे थे। वैष्णव-समाज में मुरारीपुर का आश्रम नितान्त अप्रसिद्ध नहीं है, नाना स्थानों से कीर्तन करने वाले वैरागियों के दल आने पर इस तरह का आयोजन अक्सर हुआ करता है। मठ में सब तरह के वाद्ययन्त्र मौजूद रहते हैं, देखा कि वे सब हाजिर कर दिये गये हैं। एक ओर वैष्णवियाँ बैठी हैं, सब परिचित हैं, दूसरी ओर अज्ञात-कुलशील अनेक वैरागी-मूर्तियाँ हैं, नाना उम्र और तरह-तरह के चेहरों की। बीच में विख्यात मनोहरदास और उनके मृदंगवादक आसीन हैं। मेरे कमरे पर हाल में ही दखल करने वाले नवयुवक बाबाजी हारमोनियम में सुर दे रहे हैं। यह प्रचार हो गया है कि कलकत्ते से एक सम्भ्रान्त घर की महिला आई हैं- वे ही गाना गायेंगी। वे युवती हैं और धनवती, उनके साथ आये हैं, दास-दासी, आयें हैं अनेक प्रकार के खाद्य-समूह और कोई एक नया गुसाईं भी आया है- वह है यहीं का एक घुमक्कड़।

मनोहरदास की कीर्तन की भूमिका और गौर-चन्द्रिका के1 बीच राजलक्ष्मी कमललता के पास आकर बैठ गयी। हठात् बाबाजी महोदय का गला कुछ काँपकर सँभल गया, मृदंग पर थपकी नहीं पड़ी। यह एक नितान्त दैव की ही लीला थी। सिर्फ द्वारिकादास दीवार के सहारे जैसे आँखें बन्द किये बैठे थे वैसे ही बैठे रहे। क्या मालूम, शायद वे जान ही न पाये कि कौन आया और कौन नहीं। (1. गाने के पहले चैतन्य देव की वन्दना। )

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