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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


किन्तु आज का मामला ठीक वैसा नहीं है। इस निर्जन मठ में जो कई प्राणी शान्ति से रहते हैं वे सब दीक्षित वैष्णव-धर्मावलम्बी हैं। ये लोग जाति-भेद नहीं मानते और पूर्वाश्रम की बातें कभी मन में भी नहीं लाते। इसी से किसी अतिथि के आने पर ये लोग नि:संकोच श्रद्धापूर्वक प्रसाद वितरण करते हैं और आज तक किसी ने भी प्रसाद को अस्वीकार कर इन लोगों का अपमान नहीं किया। किन्तु यह अप्रीतिकार कार्य यदि आज, बिना बुलाये आकर, हमारे ही द्वारा घटित हो तो दु:ख की सीमा न रहेगी- और विशेषकर मेरे दु:ख की। यह मैं जानता था कि कमललता मुँह से कुछ न कहेगी, किसी को कुछ कहने भी न देगी- और शायद केवल एक बार मेरी ओर देखकर ही फिर सिर नीचा कर अन्यत्र खिसक जायेगी। तब उस मूक अभियोग का क्या उत्तर होगा- खड़ा-खड़ा मैं यही सोच रहा था कि। इसी समय पद्मा ने आकर कहा, “चलो नये गुसाईं, दीदी तुम्हें बुला रही हैं। हाथ-मुँह धो लिया है?”

“नहीं।”

“तो आओ, मैं पानी देती हूँ। प्रसाद दिया जा रहा है।”

“आज क्या प्रसाद बना है?”

“आज देवता को अन्न-भोग लगा है।”

मैंने मन ही मन कहा कि तब तो और भी खुशी की खबर है। पूछा, “प्रसाद किस जगह दिया जा रहा है?”

पद्मा ने कहा, “देवगृह के बरामदे में। तुम बाबाजी लोगों के साथ बैठोगे और हम औरतें बाद में खायेंगीं। आज हम लोगों को स्वयं राजलक्ष्मी दीदी परोसेंगी।”

“वे खायेंगी नहीं?”

“नहीं, वह तो हम लोगों की तरह वैष्णव नहीं हैं, ब्राह्मण की लड़की हैं। हम लोगों का छुआ खाने से उन्हें पाप लगता है।”

“तुम्हारी कमललता दीदी नाराज नहीं हुईं?”

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