लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“देखो, क्रोध न दिलाओ। इस तरह बार-बार 'क्रीत दासी' कहकर पुकारोगे, तो अच्छा न होगा।”

“अच्छा जाओ, तुम्हें मुक्त कर दिया, अब से तुम स्वाधीन हुईं।”

राजलक्ष्मी फिर हँसी। बोली, “मैं कितनी स्वाधीन हूँ, सो इस दफा नस-नस में अनुभव कर रही हूँ। कल बातें करते-करते जब तुम सो गये, तब अपने गले पर से तुम्हारा हाथ हटाकर मैं उठ बैठी। हाथ लगाकर देखा, तुम्हारा माथा पसीने से तर हो रहा है, आँचल से पसीना पोंछकर मैं पंखा लेकर बैठ गयी। मन्द प्रकाश को तीव्र कर दिया; उस समय तुम्हारे निद्राभिभूत चेहरे की ओर देखकर आँखें हटा ही न सकी। इसके पहले क्यों नजर नहीं आया कि यह इतना सुन्दर है! अब तक क्या अन्धी थी? फिर सोचा, यदि यह पाप है तो फिर पुण्य की मुझे आवश्यकता नहीं; और यदि यह अधर्म है तो चूल्हे में जाय मेरी धर्म्मचर्चा; जीवन में यदि यह मिथ्या है तो ज्ञान होने के पूर्व ही किसके कहने से मैंने इन्हें वरण किया था?- अरे यह क्या, पीते क्यों नहीं? सारा दूध वैसा ही पड़ा है!”

“अब नहीं पिया जाता।”

“तो कुछ फल ले आऊँ?”

“नहीं, वह भी नहीं।”

“किन्तु कितने दुबले हो गये हो!”

“यदि दुबला हो भी गया हूँ, तो बहुत दिनों की अवहेलना से। एक दिन में ही सुधारना चाहोगी, तो व्यर्थ मारा जाऊँगा।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book