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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
खाने के लिए बैठते वक्त मुझे गंगामाटी के अन्तिम दिनों की बात याद आ गयी। तब यही रसोइया और यही रतन मेरे खाने की देख-रेख करते थे। राजलक्ष्मी को मेरी खबर लेने को वक्त नहीं मिलता था। पर आज इन लोगों से नहीं होगा- रसोई घर में खुद जाना होगा! पर यह उसकी प्रकृति है, वह थी विकृति। समझ गया कि कारण कुछ भी हो, किन्तु उसने अपने को फिर पा लिया है।
खाना खत्म होने पर राजलक्ष्मी ने पूछा, “पूँटू की शादी कैसी हुई?”
“आँखों से नहीं देखी पर कानों से सुनी है, अच्छी तरह हुई।”
“आँखों से नहीं देखी? इतने दिनों फिर कहाँ थे?”
विवाह की सारी घटना खोलकर सुनायी। सुनकर क्षणभर के लिए गाल पर हाथ रक्खे हुए उसने कहा, “तुमने तो अवाक् कर दिया! आने के पहले पूँटू को कुछ उपहार देकर नहीं आये?”
“मेरी तरफ से वह तुम दे देना।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “तुम्हारी तरफ से क्यों, अपनी तरफ से ही लड़की को कुछ भेज दूँगी। पर थे कहाँ, यह तो बताया ही नहीं?”
कहा, “मुरारीपुर के बाबाओं के आश्रम की याद है?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “है क्यों नहीं। वैष्णवियाँ वहीं से तो मुहल्ले-मुहल्ले में भीख माँगने आती थीं। बचपन की बातें मुझे खूब याद हैं।”
“वहीं था।”
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