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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
रतन ने पुकारा, “माँ?”
“आती हूँ,” कहकर राजलक्ष्मी सामने आकर खड़ी हो गयी और पैरों की धूल लेकर प्रणाम करके बोली, “रतन, चिलम तो भर ला, तुझे भी इधर कई दिनों से बड़ी तकलीफ दी।”
“तकलीफ कुछ भी नहीं हुई माँ। राजी-खुशी इन्हें घर लौटा लाया, यही मेरे लिए बहुत है।” कहकर वह नीचे चला गया।
राजलक्ष्मी को नयी आँखों से देखा। शरीर में रूप नहीं समाता। उस दिन की पियारी याद आ गयी। इन कई वर्षों के दु:ख-शोक के आँधी-तूफान में नहाकर मानो उसने नया रूप धारण कर लिया है। इन चार दिनों के इस नये मकान की व्यवस्था से चकित नहीं हुआ, क्योंकि उसकी सुव्यवस्था से पेड़-तले का वास-स्थान भी सुन्दर हो उठता है। किन्तु राजलक्ष्मी ने मानो अपने आपको भी इन कई दिनों में मिटाकर फिर से बनाया है। पहले वह बहुत गहने पहिनती थी, बीच में सब खोल दिये थे- मानो संन्यासिनी हो। लेकिन आज फिर पहने हैं- कुछ थोड़े से ही- पर देखने पर ऐसा लगा कि मानो वे अतिशय कीमती हैं। फिर भी धोती ज्यादा कीमती नहीं है- मिल की साड़ी- आठों पहर घर में पहनने की। माथे के आँचल की किनारी के नीचे से निकलकर छोटे-छोटे बाल गालों के इर्द-गिर्द झूल रहे हैं। छोटे होने के कारण ही शायद वे उसकी आज्ञा नहीं मानते! देखकर अवाक्! हो रहा।
राजलक्ष्मी ने कहा, “इतना क्या देख रहे हो?”
“तुमको देख रहा हूँ।”
“नयी हूँ?”
“ऐसा ही तो लग रहा है।”
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