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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
इस बार वैष्णवी ने जरा हँसकर कहा, “नहीं, वह भी मैं न दूँगी। इस समय तुम्हारी जो इच्छा हो सोच लो गुसाईं, एक दिन अपने आप ही उसका जवाब मिल जाएगा।”
कई बार इन शब्दों ने जबान पर आना चाहा, कि अब तो वक्त नहीं है कमललता, कल जाऊँगा- पर किसी भी तरह कह नहीं पाया। यही कहा कि “जाता हूँ।”
पद्मा निकट आकर खड़ी हो गयी। कमललता की देखा देखी उसने भी हाथ जोड़कर नमस्कार किया। वैष्णवी ने उससे नाराज होकर कहा, “हाथ जोड़कर नमस्कार क्या करती है जलमुँही, पैरों की धूल लेकर प्रणाम कर।”
इस बात से मानो मैं चौंक पड़ा। उसके मुँह की ओर नजर करते ही देखा कि उसने दूसरी ओर मुँह फेर लिया है। तब और कुछ न कहकर मैं उनका आश्रम छोड़कर बाहर चल दिया।
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