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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
और भी दो दिन कट गये, किन्तु अब और नहीं। कमललता स्वस्थ हो गयी है, पद्मा और लक्ष्मी-सरस्वती दोनों बहिनों की तबीयत भी ठीक हो गयी है। द्वारिका दास कल शाम को लौट आये हैं, उनसे बिदा माँगने गया। गुसाईंजी ने कहा, “आज जाओगे गुसाईं? अब कब आओगे?”
“यह तो नहीं जानता गुसाईंजी।”
“लेकिन कमललता तो रो-रोकर अधमरी हो जायेगी।”
यह जानकर मन ही मन बहुत बिगड़ा कि इनके कानों में भी हमारी बात पहुँच गयी है। कहा, “वह क्यों रोने लगी?”
गुसाईंजी ने जरा हँसकर कहा, “शायद तुम नहीं जानते?”
“नहीं।”
“उसका स्वभाव ही ऐसा है। किसी के चले जाने पर वह शोक में अधमरी हो जाती है।”
यह बात और भी बुरी लगी। कहा, “जिसकी आदत ही शोक करने की है वह तो करेगा ही। मैं उसे रोक कैसे सकता हूँ?” पर यह कहा और उनकी आँखों की तरफ देखकर मुँह फेरा ही था कि देखा, मेरे पीछे कमललता खड़ी है।
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