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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
'उन लोगों' के माने अन्यान्य वैष्णवियाँ। यहाँ दो दिन रहकर यह गौर कर रहा था कि सबकी आड़ में रहकर मठ का समस्त गुरु-भार कमललता अकेली वहन करती है। सब व्यवस्थाओं में उसका कर्तृत्व है सबके ऊपर, किन्तु स्नेह से, सौजन्य से और सर्वोपरि सविनय कर्मकुशलता से यह कर्तृत्व इतनी सहज श्रृंखला में प्रवहमान है कि कहीं भी ईर्ष्या-विद्वेष का जरा-सा भी मैल नहीं जमने पाता। यह सोचकर मुझे भी क्लेश हुआ कि यही आश्रम-लक्ष्मी आज उत्कण्ठ व्याकुलता के साथ जाऊँ-जाऊँ कर रही है। यह कितनी बड़ी दुर्घटना है, कितनी बड़ी निरुपाय दुर्गति में इतने निश्चिन्त नर-नारी गिर पड़ेंगे। इस मठ में सिर्फ दो दिन से हूँ, पर न जाने कैसा एक आकर्षण अनुभव कर रहा हूँ- ऐसा मनोभाव हो गया है कि मानो इसकी आन्तरिक शुभाकांक्षा चाहे बिना रह ही नहीं सकता। सोचा, लोग यह गलत कहते हैं कि सबको मिला कर आश्रम है और यहाँ सभी समान हैं। पर यह मानो आँखों के सामने ही देखने लगा कि इस एक के अभाव में केन्द्र भ्रष्ट उपग्रह की तरह समस्त आयतन ही दिशा-विदिशाओं में विच्छिन्न-विक्षित होकर टूट सकता है। कहा, “और नहीं सोऊँगा कमललता, चलो तुम्हारे साथ चलकर फूल चुन लाऊँ।”
वैष्णवी ने कहा, “तुमने स्नान नहीं किया है, कपड़े भी नहीं बदले हैं- तुम्हारे छुए हुए फूलों से पूजा होगी?”
मैंने कहा, “फूल मत तोड़ने देना, पर डाल को नीचा कर पकड़ने तो दोगी? यह भी तुम्हारी सहायता होगी।”
वैष्णवी ने कहा, “डाल नीची करने की जरूरत नहीं होती, छोटे-छोटे पेड़ हैं- मैं खुद ही कर लेती हूँ।”
कहा, “कम-से-कम साथ रहकर सुख-दु:ख की दो-चार बातें तो कर सकूँगा?” इसमें भी तुम्हारी मेहनत कम होगी।”
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