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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
रजनी को अन्त भयौ, दिनने पट खोले॥
“गुसाईं जी, और कितनी देर तक सोओगे? उठो।”
बिछौने पर उठ बैठा। मसहरी उठाई, पूर्व की खिड़की खुली हुई है- सामने की आम्र-शाखाओं में पुष्पित लवंग-मंजरी के कई बड़े-बड़े गुच्छ नीचे तक झूल रहे हैं। उनकी सैंधों में से दिखाई दिया कि आकाश में कई जगह हल्के लाल रंग का आभास है, जैसे अंधेरी रात में सुदूर ग्राम के अन्त में आग लग गयी हो। मन में कहीं कुछ व्यथा-सी होने लगी। कुछ चमगीदड़ उड़ करके अपने आवासों को लौट रहे हैं। उनकी पंखों की फड़फड़ाहट बार-बार कानों में आने लगी। ऐसा लगने लगा कि रात्रि खत्म हो रही है। यह नीलकण्ठों, बुलबुलों और श्यामा पक्षियों का देश है। मानो, यह उनकी राजधानी 'कलकत्ता शहर' है और यह विशाल बकुल-वृक्ष (मौलसिरी) उनके लेन-देन और काम-काज का 'बड़ा बाजार' है जहाँ दिन के वक्ती की भीड़ देखकर अवाक् हो जाना पड़ता है। तरह-तरह की शकलें, तरह-तरह की भाषा और रंग-बिरंगी पोशाक का बहुत ही विचित्र समावेश है। रात को अखाड़े के चारों ओर के वन में डाल-डाल कर उनके अगणित अड्डे हैं। नींद खुल जाने की आहट कुछ-कुछ पाई गयी। उससे मालूम हुआ कि मानो हाथ-मुँह धोकर वे तैयारी कर रहे हैं। अब सारे दिन चलने वाले नाच-गान का महोत्सव शुरू होगा। ये सब लखनऊ के उस्ताद हैं जो थकते भी नहीं और कसरत भी बन्द नहीं करते। भीतर वैष्णवों का कीर्तन शायद कभी बन्द भी हो जाय, परन्तु बाहर इस बला के बन्द दोने की सम्भावना नहीं है। यहाँ पर छोटे-बड़े, भले-बुरे का विचार नहीं है। इच्छा और समय चाहे हो या न हो, गाना तुम्हें सुनना ही पड़ेगा। इस देश की, मालूम होता है, यही व्यवस्था है, यही नियम है।
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