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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
कहा, “हाँ, दुखी हुआ हूँ।”
क्षणभर के लिए वैष्णवी चुप रही, फिर बोली, “जंगल में वह आदमी तुमसे क्या कह रहा था?”
“तुमने देखा था क्या?”
“हाँ।”
“कह रहा था कि वह तुम्हारा पति है- अर्थात्, तुम्हारे सामाजिक आचारों के मुताबिक तुम्हारी उसकी कंठी-बदल हुई है।”
“तुमने विश्वास किया?”
“नहीं, नहीं किया।”
क्षणभर के लिए फिर मौन रहकर वैष्णवी ने कहा, “उसने मेरे स्वभाव और चरित्र के बारे में कुछ इशारा नहीं किया?”
“किया था।”
“और मेरी जातिका?”
“हाँ, उसका भी।”
वैष्णवी ने कुछ ठहरकर कहा, “सुनोगे मेरे बचपन का इतिहास? शायद तुम्हें घृणा हो जाय।”
“तो रहने दो, मैं नहीं सुनना चाहता।”
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