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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“क्या यह जान सकता हूँ कि आप यहाँ कब आये हैं?”
“जान सकते हैं। कल शाम को आया हूँ।”
“रात को अखाड़े में शायद थे?”
“हाँ, था।”
“ओ:!”
नीरवता में ही कुछ क्षण कटे। पैर बढ़ाने की कोशिश करते ही उस आदमी ने कहा, “आप तो वैष्णव नहीं हैं, भले आदमी हैं- अखाड़े में आपको रहने दिया?”
मैंने कहा, “यह तो वे ही जानें। उन्हीं से पूछिए।”
“ओ:, शायद कमललता ने रहने के लिए कहा होगा?”
“हाँ।”
“ओ:, जानते हैं उसकी असली नाम क्या है? उषांगिनी। मकान सिलहट में है किन्तु दिखती है कलकत्ते जैसी। मेरा घर भी सिलहट में है। गाँव का नाम है महमूदपुर। उसके स्वभाव-चरित्र के बारे में कुछ सुनेंगे?”
मैंने कहा, “नहीं।” पर उस आदमी के हाव-भाव देखकर इस बार सचमुच ही विस्मित हो उठा। प्रश्न किया, “कमललता के साथ आपका कोई सम्बन्ध है?”
“है क्यों नहीं!”
“वह क्या?”
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