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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
वैष्णवी ने कहा, “जाती हूँ इसलिए कि देने के लिए वे हाथ बढ़ाये दरवाजे-दरवाजे खड़े हैं। नहीं तो हमारी गरज नहीं है। अगर होती तो नहीं जातीं। बिना खाये ही सूख-सूख मर जातीं, तो भी नहीं जातीं।”
“कमललता, तुम्हारा देश कहाँ है?”
“कल ही तो कहा था गुसाईं, मेरा घर पेड़ के नीचे है, मेरा देश गली-गली में है।”
“तो पेड़ के नीचे और गली-गली में न रहकर मठ में किस लिए रहती हो?”
“बहुत दिनों तक गली-गली में ही थी गुसाईं- अगर कोई संगी मिल जाय तो फिर एक बार गली को संबल बना लूँ।”
मैंने कहा, “इस बात पर तो विश्वास नहीं होता। तुम्हें संगी-साथी की क्या कमी है कमललता? जिससे कहोगी वही राजी हो जायेगा।”
वैष्णवी ने हँसते हुए कहा, “तुम्हीं से कहती हूँ नये गुसाईं- राजी होगे?”
मैं भी हँसा। कहा, “हाँ, राजी हूँ। नाबालिग उम्र में जो यात्रा के दल से नहीं डरा, बालिग अवस्था में उसे वैष्णवी का क्या डर?”
“यात्रा के दल में भी रहे थे?”
“हाँ।”
“तो गाना भी गा सकते हो?”
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