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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
वैष्णवी बोली, “यही हमारी भजन-साधना है।”
“यह रसोई बनाना, पानी भरना, कूटना-फटकना, माला गूँथना, कपड़े रंगना- इसी को 'साधना' कहते हैं?”
वैष्णवी ने कहा, “हाँ, इसी को साधना कहते हैं। दास-दासियों की इससे बढ़कर साधना हमें और कहाँ मिलेगी गुसाईं?” कहते-कहते उसकी दोनों सजल आँखें मानो अनिर्वचनीय मधुरता से परिपूर्ण हो उठीं। एकाएक मुझे खयाल हुआ कि इस अपिरिचित वैष्णवी का मुँह जितना सुन्दर है, उतना सुन्दर मुँह मैंने संसार में कभी नहीं देखा। कहा, “कमललता, तुम्हारा मकान कहाँ है?”
वैष्णवी ने आँचल से आँखें पोंछकर हँसते हुए कहा, “पेड़ की छाया।”
“पर पेड़ की छाया तो हमेशा न थी?”
वैष्णवी ने कहा, “तब था ईंट और काठ के बने हुए किसी मकान का एक छोटा-सा कमरा। पर कहानी सुनाने का वक्त तो अब नहीं है गुसाईं । मेरे साथ आओ, तुम्हारा नया कमरा दिखा दूँ।”
कमरा बढ़िया है। उसने बाँस की खूँटी पर टँगा हुआ एक साफ रेशम का कपड़ा दिखाते हुए कहा, “यह पहनकर ठाकुरजी के कमरे में आना। देखो, देर न करना।” कहकर वह तेजी से चली गयी।
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