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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


उस स्वल्पतोया नदी का थोड़ा-सा हिस्सा शायद गाँव वालों ने साफ कर लिया है। सामने के उस स्वच्छ काले और थोड़े पानी पर छोटी-छोटी रेखाओं में चन्द्रमा और सांध्य तारे का प्रकाश पास-पास ही पड़कर झिलमिला रहा है- मानो सुनार कसौटी पर सोना घिसकर दाम जाँच रहा हो। पास ही कहीं वन में सैकड़ों वन-मल्लिकाएँ खिली हैं और मानो उनकी गन्ध से सारी वायु भारी हो उठी है। निकट के ही किसी पेड़ के असंख्य चिड़ियों के घोंसलों से उनके बच्चों की एक-सी चीं-चीं विचित्र मधुरता से कानों में अविराम आ रही है। यह सब ठीक है, और तद्गत-चित्त जो दो आदमी जड़-भरत की तरह बैठे हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं, वे भी कवि हैं। पर शाम के वक्त इस जंगल में मैं यह सब देखने नहीं आया हूँ। नवीन ने कहा था कि वैष्णवियों का एक दल का दल यहाँ है और उनमें कमललता वैष्णवी सबसे श्रेष्ठ हैं। वे कहाँ हैं? पुकारा, “गौहर।” ध्यान भंगकर गौहर हतबुद्धि की तरह मेरी ओर ताकता रह गया।

बाबाजी ने उसे जरा हिलाकर कहा, “गुसाईं, ये ही तुम्हारे श्रीकान्त हैं न?”

गौहर ने तेजी से उठकर मुझे बड़े जोर से बाहुपाश में आबद्ध कर लिया, इस तरह कि जैसे उसका वह आवेग रुकना ही नहीं चाहता हो। किसी तरह मैं अपने को मुक्त कर बैठ गया। बोला, “गुसाईं जी ने मुझे एकाएक कैसे पहिचान लिया?”

बाबा जी ने हाथ हिलाया, “यह नहीं होगा गुसाईं, इसमें से आदर-वाचक 'जी' बाद देना होगा। तब ही तो रस आयेगा।”

मैंने कहा, “अच्छा, बाद दे दिया। लेकिन एकाएक मुझे कैसे पहिचाना?”

बाबाजी ने कहा, “एकाएक कैसे पहचानूँगा? तुम तो वृन्दावन के हमारे पहचाने हुए हो गुसाईं, और तुम्हारी दोनों आँखें तो रस की समुद्र हैं जो देखते ही आँखों में भर जाती हैं। जिस दिन कमललता आई थी, उसकी दोनों आँखें भी ऐसी ही थीं, उसे देखते ही पहिचान गया और बोल उठा, 'कमललता, कमललता, इतने दिनों कहाँ थी?” कमल आकर जो अपनी हो गयी तो उसका आदि-अन्त, विरह-विच्छेद नहीं रहा। यही तो साधना है गुसाईं, इसी को तो कहता हूँ रस की दीक्षा।”

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