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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


पूँटू पीठ किये खिड़की के बाहर देख रही है और दरवाजे की आड़ में रतन कान लगाये खड़ा है, यह अच्छी तरह मालूम हो गया।

मैंने कहा, “वचन देकर तो नहीं आया था, यह आप भी जानते हैं और मैं भी। कहा था कि एक व्यक्ति की अनुमति मिल जाने पर राजी हो सकता हूँ।”

“अनुमति नहीं मिली?”

“नहीं।”

बाबा एक क्षण ठहरकर बेले, “पूँटू के पिता कहते हैं कि सब मिलाकर वह एक हजार रुपये देंगे। ज्यादा जोर लगाने पर और भी सौ-दो सौ दे सकते हैं; क्या कहते हो?”

रतन ने कमरे में घुसकर कहा, “तम्बाकू क्या एक बार और बदल दूँ?”

“बदल दो। तुम्हारा नाम क्या है जी?”

“रतन।”

“रतन? बड़ा सुन्दर नाम है, कहाँ रहते हो?'

“काशी में।”

“काशी? देवी आजकल शायद काशी में रहती है? वहाँ क्या करती है।”

रतन ने मुँह ऊपर उठाकर कहा, “उस समाचार से आपको मतलब?”

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