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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“काशीधाम

“प्रणाम के उपरान्त सेविका का निवेदन।

“इस बार मिलाकर कुल सौ दफा तुम्हारी चिट्ठी पढ़ी। तो भी यह समझ में नहीं आया कि तुम पागल हो गये हो या मैं। तुमने शायद यह खयाल किया है कि मैंने तुम्हें पड़ा हुआ पा लिया था। परन्तु तुम कहीं पड़े हुए नहीं थे, तुम बहुत तपस्या के बाद मिले थे, बहुत आराधाना के बाद। इसीलिए, बिदा देने के मालिक तुम नहीं। मुझे त्याग करने का मालिकाना स्वत्वाधिकार तुम्हारे हाथों में नहीं है।

“तुम्हें याद नहीं, फूलों के बदले वन से करौंदे तोड़, उनकी माला गूँथकर, किस शैशव में तुम्हें वरण किया था। हाथों में काँटे चुभ जाने की वजह से खून बहने लगता था, लाल माला का वह लाल रंग तुम नहीं पहिचान सके थे। बालिका की पूजा का अर्घ्य उस दिन तुम्हारे गले में था। परन्तु तुम्हारे हृदय पर रक्त-रेखा से जो लेखा अंकित कर देती थी, वह तुम्हारी नज़रों में नहीं पड़ी। पर जिसकी नजरों से संसार का कुछ भी छिपा नहीं रह सकता, उनके पाद-पद्मों में मेरा वह निवेदन पहुँच गया था।

“उसके बाद आई दुर्योग की रात। काले मेघों ने मेरे आकाश की ज्योत्स्ना ढँक दी। किन्तु वास्तव में वह मैं हूँ या और कोई, इस जीवन में यथार्थ रूप में वे सब बातें हुई थीं या सोते-सोते स्वप्न देख रही थी-यह सोचते ही बहुधा मुझे डर लगता है मैं पागल हो जाऊँगी। तब सब भूलकर जिसका ध्यान लगाकर बैठती हूँ, उसका नाम नहीं लिया जाता। किसी से कहने की बात नहीं है। उनकी क्षमा ही मेरे जगदीश्वर की क्षमा है। इसमें गलती नहीं है, सन्देह नहीं। यहाँ मैं निर्भय हूँ।

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