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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


ऐसा लगा कि कुछ दिनों से क्रोध और क्षोभ से रतन फूल रहा है। बोला, “माँ जब देती हैं तो दोनों हाथों से उड़ेल देती हैं। बंकू को भी दिया है, इसीलिए उसने यह सोच लिया है कि मधु निचोड़े हुए छत्ते की क्या कीमत?- इस वक्त तो ज्यादा-से-ज्यादा उसे जलाया ही जा सकता है। इसलिए उसको वे इतनी अप्रिय हो रही हैं। मूरख यह नहीं जानता कि आज भी माँ का एक गहना बेचने पर ऐसे पाँच मकान तैयार हो सकते हैं।”

मैं भी यह न जानता था। हँसकर कहा, “ऐसी बात है? पर वह सब हैं कहाँ?”

रतन भी हँसा। बोला, “उन्हीं के पास है। माँ ऐसी बेवकूफ नहीं। सिर्फ आप ही के चरणों पर सर्वस्व लुटाकर वे भिखारिणी हो सकती हैं, किन्तु और किसी के भी लिए नहीं। बंकू नहीं जानता है कि आपके जिन्दा रहते माँ को आश्रय की कमी न होगी, और जब तक रतन जीवित है तब तक उन्हें नौकर के लिए भी सोचने की जरूरत नहीं। उस दिन काशी से आपके इस तरह चले आने की वजह से माँ के हृदय में कैसा तीर चुभा है, इसकी खबर क्या बंकू बाबू रखते हैं? गुरु महाराज को भी उसकी खोज-खबर कहाँ से मिल सकती है?”

“पर मुझे तो उन्होंने ही खुद बिदा किया था, इसकी खबर तो रतन, तुम्हें है?”

जीभ निकालकर रतन शर्म से गड़ गया। उसमें इतनी विनय इसके पहले कभी न देखी थी। कहा, “बाबू, हम तो नौकर-चाकर हैं, ये सब बातें हमारे कानों को नहीं सुननी चाहिए। यह झूठ है।”

रतन थकावट मिटाने के लिए चला गया। शायद कल आठ बजे के पहले उसके शरीर में स्फूर्ति नहीं आयेगी।

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