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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“और अगर उस वक्त रुपयों की जरूरत हो तो मुझे खबर दे देना। बाबूजी बहुत रूपये छोड़ गये हैं, वह मेरे काम में तो लगा नहीं - किन्तु शायद तुम लोगों के काम में लग जाये।”

उसके कहने का तरीका कुछ ऐसा था कि सुनते ही आँखों से अश्रु निकल पड़े। कहा, “अच्छा, यह भी खबर दूँगा। पर आशीर्वाद दो कि इसकी कभी जरूरत न पड़े।”

मेरे जाने के दिन गौहर फिर मेरा बैग उठाकर प्रस्तुत हो गया। इसकी जरूरत न थी, नवीन तो शर्म से प्राय: अधमरा हो गया, पर उसने एक न सुनी। ट्रेन में बैठाकर वह औरतों की तरह रो उठा, बोला, “मेरे सिरकी कसम है श्रीकान्त, चले जाने के पहले एक दिन फिर आना ताकि फिर एक बार मुलाकात हो जाय।”

आवेदन की उपेक्षा नहीं कर सका, वचन दिया कि मिलने के लिए फिर एक बार आऊँगा।

“कलकत्ता पहुँचकर कुशल-संवाद दोगे न?”

यह वचन भी दिया। मानो न जाने कितनी दूर चला जा रहा हूँ!

कलकत्ते के मकान में जब पहुँचा, तब प्राय: संध्या हो गयी थी। चौखट पर पैर रखते ही जिसके दर्शन हुए, वह और कोई नहीं स्वयं रतन था।

“यह क्या रे, तू है?”

“हाँ, मैं ही हूँ और कल से बैठा हूँ। एक चिट्ठी है।” समझ गया कि उसी प्रार्थना का उत्तर है। कहा, “डाक से भेजने पर भी तो चिट्ठी मिल जाती?”

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