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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
सवाल का जवाब देकर मैं उस छोटे से कागज को मुट्ठी में छिपाकर धीरे-धीरे निकल आया। बरामदे के बाहर का वह मोढ़ा इस समय शून्य था। रोहिणी भइया को भी मैं आसपास कहीं न देख सका। डेरे पर पहुँचने तक मैं अपना कुतूहल दमन न कर सका! पास में ही रास्ते के बगल में एक छोटी-सी चाय की दुकान देखकर उसमें घुस गया और लैम्प के उजाले में मैंने उस पत्र को अपनी आँखों के सम्मुख खोलकर रख लिया। पेंन्सिल की लिखावट थी किन्तु ठीक पुरुष के से हस्ताक्षर थे। सबसे पहले उसने अपने पति का नाम और उसका पुराना ठिकाना देकर नीचे लिखा था, “आज आप जो अपने मन में धारणा लिये जा रहे हैं सो मैं जानती हूँ; और विपत्ति के समय मुझे आपका कितना भरोसा है सो भी आप जानते हैं। इसीलिए मैंने आपका ठिकाना पूछ लिया है।”
अभया के इस लेख को मैंने बार-बार पढ़ा परन्तु उसमें इन कुछ थोड़ी-सी बातों के सिवाय और किसी भी अतिरिक्त बात का अन्दाजा नहीं लग सका। आज इन लोगों का परस्पर व्यवहार अपनी नजर से देखकर कोई बाहरी आदमी जो भी सोच सकता है उसका अनुमान करना अभया सरीखी बुद्धिमती रमणी के लिए बिल्कुल ही कठिन नहीं है। किन्तु फिर भी वह अन्दाज सही है या गलत, इस सम्बन्ध में बिन्दु-मात्र भी उसने इशारा नहीं किया। उसके पति का नाम और ठिकाना तो मैंने पहले ही सुना है, पर विपत्ति के समय वह उसकी खोज करना चाहती है या नहीं, अथवा और कौन-सी विपत्ति अवश्यम्भावी समझकर उसने मेरा पता ले लिया है- आदि किसी बात का आभास तक भी मैं उस लेख में खोजकर बाहर न निकाल सका। बातचीत से अनुमान होता है कि रोहिणी किसी दफ्तर में नौकरी पा गया है। किस तरह पा गया है सो भी मुझे मालूम नहीं हुआ। पर हाँ खाने-पीने की दुश्चिन्ता कम से कम मेरी तरह उन्हें नहीं है- पूड़ियाँ भी खाने को मिल जाती हैं। फिर भी, अभया ने किस किस्म की विपत्ति की सम्भावना के लिए मुझे तैयार कर रक्खा है और ऐसा करने से उसने क्या लाभ सोच रक्खा है, सो अभया ही जाने।
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