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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
इन लोगों के साथ मैं बहुत दिनों तक रहा। किन्तु जब तक उन्हें यह न मालूम हुआ कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ, केवल तब तक ही मुझे इनके साथ घनिष्ठता से मिलने-जुलने का सुयोग मिलता रहा- उनके सब तरह के सुख-दु:खों में मैं भी हिस्सेदार बनता रहा, किन्तु जिस क्षण ही उन्हें मालूम हुआ कि मैं भला आदमी हूँ और मुझे अंगरेजी आती है, उसी क्षण से उन्होंने मुझे गैर समझना शुरू कर दिया। अंगरेजी जानने वाले शिक्षित भले आदमियों के समीप ये लोग आपद्-विपद् के समय जाते जरूर हैं, उनसे सलाह-मशविरा भी करते हैं- यह भी सच है, परन्तु, ये लोग न तो उन पर विश्वास ही करते हैं और न उन्हें अपना आदमी ही समझते हैं। देश के इस कुसंस्कार को वे आज भी दूर नहीं कर पाए हैं कि मैं उन्हें छोटा समझकर मन ही मन घृणा नहीं करता हैं,- पीछे-पीछे उनका उपहास नहीं करता हूँ। केवल इसी कारण मेरे कितने सत्संकल्प इन लोगों के बीच विफल हो गये हैं। मैं समझता हूँ, उनकी कोई सीमा नहीं। किन्तु खैर, आज इस बात को जाने दो।
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