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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
वह बोली, “वे लोग तो हल के दर्जे के लोहा काटने-पीटनेवाले मजदूर हैं बाबू, उनके साथ आपको कैसे खिलाया जा सकता है?”
अर्थात् वे थे 'वर्कमेन' और मैं था 'भला आदमी'। मैंने हँसकर कहा, “मुझे भी यहाँ क्या-क्या काटना-पीटना पड़ेगा सो तो अब भी निश्चित नहीं हुआ है। जो भी हो, आज खिलाती हो तो खिला जाओ, किन्तु, कल से मुझे भी उन्हीं के साथ उसी कमरे में खिलाना।”
दासी बोली, “आप बाम्हन हैं, आपको वहाँ खाने की जरूरत नहीं।”
“क्यों? वे सब बंगाली तो हैं?”
दासी ने गले को जरा धीमा करके कहा, “बंगाली जरूर हैं, किन्तु उनमें एक डोम भी है।”
डोम! देश में यह जाति अस्पृश्य-अछूत है। छू जाने पर स्नान करना 'कम्पलसरी' (अनिवार्य) है या नहीं सो तो नहीं मालूम; किन्तु यह जानता हूँ कि कपड़े बदलकर गंगाजल सिर पर छिड़कना पड़ता है। अत्यन्त अचरज से मैंने पूछा, “और सब?”
दासी बोली, “और सब अच्छी जाति के हैं। कायथ हैं, कैवर्त (केवट) हैं, अहीर हैं, लुहार...”
“ये लोग कोई आपत्ति नहीं करते?”
दासी अब कुछ हँसकर बोली, “इस पर देश में सात समुन्दर पार आकर क्या इतनी बमहनयी चल सकती है बाबू? वे कहते हैं, देश लौटकर गंगा-स्नान करके एक अंग-प्रायश्चित कर लेंगे।
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