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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “नहीं, मुझे अभी काफी देर है, मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। एकदम शहर में जाकर उतरूँगा।”
अभया बोली, “नहीं, शीघ्र सामान ठीक कर लीजिए।”
मैंने कहा, “मुझे अब भी बहुत समय है।...”
अभया ने प्रबल वेग से सिर हिलाकर कहा, “नहीं, सो नहीं हो सकता, मुझे छोड़कर आप किसी तरह नहीं जाने पाएँगे।”
मैं अवाक् होकर बोला, “यह क्या? मेरा तो वहाँ जाना नहीं हो सकेगा।”
अभया बोली, “तो फिर, मेरा भी नहीं हो सकेगा। मैं पानी में भले ही फाँद पड़ूँ, परन्तु, निराश्रय होकर इस जगह किसी तरह नहीं जाऊँगी। वहाँ की सब बातें सुन चुकी हूँ।” यह कहते-कहते उसकी आँखें छलछला आईं। मैं हतबुद्धि-सा होकर बैठा रहा। “यह कौन है जो मुझे इस तरह धीरे-धीरे जोर डालकर अपने जीवन के साथ जकड़ रही है?
वह आँचल से आँखें पोंछकर बोली, “मुझे अकेली छोड़कर चले जावेंगे? मैं नहीं सोच सकती कि आप इतने निष्ठुर हो सकते हैं। उठिए, नीचे चलिए। आप न होंगे तो उस बीमार आदमी को साथ लेकर मैं अकेली औरत-जात क्या करूँगी, आप ही बताइए?”
अपना माल-असबाब लेकर जब मैं छोटे स्टीमर पर चढ़ा तब डॉक्टर बाबू ऊपर के डेक पर खड़े थे। हठात् मुझे इस अवस्था में देखकर वे हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहने लगे, “नहीं नहीं, आपको न जाना होगा। लौट आइए, लौट आइए- आपके लिए हुक्म हो गया है, आप...”
मैंने भी हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहा, “असंख्य धन्यवाद, किन्तु एक और हुक्म से मुझे जाना पड़ रहा है।”
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