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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
दूसरे दिन ग्यारह-बारह बजे के बीच जहाज रंगून पहुँचने वाला था; किन्तु भोर होने के पहले से ही सब लोगों की आँखों और चेहरों पर भय और चंचलता के चिह्न नजर आने लगे। चारों ओर से एक अस्फुट शब्द कानों में आने लगा, 'केरेंटिन, केरेंठिन।' पता लगाने से मालूम हुआ कि ठीक शब्द 'कारेंटाइन' है। उस समय बर्मा की सरकार प्लेग के डर से अत्यन्त सावधान थी। शहर से आठ-दस मील दूर पर रेत में काँटेदार तारों से थोड़ा-सा स्थान घेरकर उसमें बहुत-सी झोपड़ियाँ खड़ी कर दी गयी थीं- इसमें ही डेक के समस्त यात्रियों को बिना कुछ विचार किये उतार दिया जाता था। यहाँ पर दस दिन ठहरने के बाद उन्हें शहर में जाने दिया जाता था। हाँ, यदि किसी का कोई आत्मीय शहर में होता और वह पोर्ट हेल्थ ऑफिसर के पास जाकर किसी कौशल से 'छोड़पत्र' जुटा सकता तो बात जुदी थी।
डॉक्टर बाबू मुझे अपने कमरे में बुलाकर बोले, “श्रीकान्त बाबू, एक 'छोड़पत्र' जुटाए बगैर आपका यहाँ आना उचित नहीं हुआ; कारेंटाइन में ले जाकर वे लोग मनुष्य को इतना कष्ट देते हैं कि कसाईखाने के गाय-बैल-भेड़ आदि जानवरों को भी उतना कष्ट नहीं सहना पड़ता। साधारण आदमी तो उसे किसी तरह सह लेते हैं, मर्मांन्तिक कष्ट तो केवल भले आदमियों को ही सहना पड़ता है। एक तो यहाँ कोई मजूर नहीं मिलता-अपना सब माल-असबाब अपने ही कन्धों पर लादकर एक सीधी जर्जर सीढ़ी पर से चढ़ना-उतरना होता है, और उतनी दूर ले जाना पड़ता है। इसके बाद, सारा माल-असबाब वहाँ खोलकर बिखेर दिया जाता है और स्टीम में उबालकर बर्बाद किया जाता है। और महाशय, ऐसी कड़ी धूप में तो कष्ट का कोई पार ही नहीं रहता।”
अत्यन्त भयभीत होकर मैंने कहा, “इसका कोई प्रतिकार नहीं है क्या डॉक्टर बाबू?”
उन्होंने सिर हिलाकर कहा, “नहीं-हाँ, जब डॉक्टर साहब जहाज के ऊपर चढ़ आवेंगे तब मैं उनसे कह देखूँगा। उनका क्लर्क यदि आपकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को राजी होगा तो...”
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