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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“और बिस्कुट?”
“सो भी खाता हूँ?”
“अच्छा।”
खाना-पीना समाप्त होने के बाद दोनों आमने-सामने कुर्सियों पर बैठ गये। डॉक्टर बाबू बोले, “आज कैसे जा भिड़े उस औरत से?”
मैंने कहा, “उसने ही मुझे बुला भेजा था।”
डॉक्टर बाबू इस तरह सिर हिलाकर कि मानो सब कुछ जानते हों, बोले, “बुलाना ही चाहिए- शादी-वादी की है या नहीं?”
मैंने कहा, “नहीं।”
डॉक्टर बाबू बोले, “तो बस, भिड़ जाओ। ऐसी कुछ बुरी नहीं है। उस आदमी का चेहरा देखा, उस पर टाईफाइड के लक्षण नजर आते हैं। कुछ भी हो, वह अधिक दिन न टिकेगा, यह निश्चित है। इस बीच उस पर नजर बनाए रखना। कहीं और कोई साला न भिड़ जाय।”
मैं अवाक् होकर बोला, “आप यह सब कह क्या रहे हैं, डॉक्टर बाबू?”
डॉक्टर बाबू जरा भी अप्रतिभ हुए बिना बोले, “अच्छा, वह छोकरा ही उसे घर से निकाल लाया है या उसी को वह बाहर निकाल लाई है- तुम्हें क्या मालूम होता है, श्रीकान्त बाबू? खूब फारवर्ड है। बातचीत तो बहुत अच्छी करती है।”
मैंने कहा, “इस तरह का खयाल आपके मन में क्यों आया?”
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