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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“भारद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा! जिनहिं रामपद अति अनुरागा।।”
अर्थात् “स्ट्राइक दि टेण्ट” (तम्बू उखाड़ लो)- प्रयाग की यात्रा करनी होगी। परन्तु, यह कार्य कुछ सहज नहीं था, संन्यासी की यात्रा जो ठहरी! सधे हुए टट्टुओं को खोजते और उन पर सामान लादते, ऊँट पर महाराज की जीन कसते, गाय-बकरियों को साथ लेते, गट्ठे गठरियाँ बाँधते, सिलसिले से लगाते लगाते, एक पहर बीत गया। इसके बाद खाना खाकर दो कोस दूर संध्या् के पहले ही बिठौरा गाँव के गेंवडे एक विराट वटवृक्ष के नीचे डेरा जमाया गया। जगह बहुत ही सुन्दर थी, गुरु महाराज को खूब पसन्द आई। यह तो हुआ, परन्तु भारद्वाज मुनि के उस स्थान तक पहुँचते-पहुँचते कितने महीने लग जायेंगे, इसका मैं अनुमान नहीं कर सका।
इस बिठौरा गाँव का नाम अभी तक मुझे क्यों याद रहा है सो यहाँ कहता हूँ। उस दिन पूर्णिमा तिथि थी; इसलिए, गुरु के आदेश से हम तीनों जने तीन दिशाओं में भिक्षा के लिए बाहर निकल पड़े थे। अकेला होता तो उदर-पूर्ति के लिए कम कोशिश न करता। परन्तु, आज मेरी वह चाल नहीं थी, इसलिए बहुत कुछ निरर्थक यहाँ-वहाँ घूम रहा था। एकाएक एक मकान के खुले दरवाजे के भीतर से मुझे एक बंगाली लड़की का चेहरा दिखाई पड़ गया। उसके कपड़े यद्यपि देशी करघे पर बुने हुए टाट की तरह मोटे थे, किन्तु उन्हें पहिनने के विशेष ढंग ने ही मेरे कुतूहल को उत्तेजित कर दिया। मैंने सोचा, पाँच-छ: दिन से इस गाँव में हूँ, करीब-करीब सब घरों में हो आया हूँ, परन्तु बंगाली स्त्री तो दूर की बात, बंगाली पुरुष का चेहरा तक भी नज़र नहीं आया। साधु-संन्यासियों के लिए कहीं रोक-टोक नहीं। भीतर प्रवेश करते ही वह स्त्री मेरी ओर देखने लगी। उसका मुँह मैं आज भी याद कर सकता हूँ। इसका कारण यह है कि दस-ग्यारह वर्ष की लड़की की आँखों में इतनी करुण, इतनी मलिन-उदास दृष्टि और कहीं कभी देखी है, ऐसा मुझे याद नहीं आता। उसके मुँह से, उसके होठों से, उसकी आँखों से-उसके सर्वांग से मानो दु:ख और निराशा फूटी पड़ती थी। मैंने एकबारगी बँगला में कहा, “कुछ भिक्षा देना, माँ।” पहले तो वह कुछ न बोली। इसके बाद उसके होंठ एक-दो बार काँपकर फूल उठे और वह भर-भराकर रो उठी।
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